देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं संभाग में सिर में च्यूडे पूजने की परंपरा आज भी है कायम

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आज पूजते हैं कुमाऊँ में च्यूडे,,,,,,,, जी रया जागि रया यो दिन मास भेटनै रया ।सिहक जस तराण स्यावक जैसि बुद्धि हो,, आज भाई दूज के दिन देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं संभाग में सिर में च्यूडे पूजने की परंपरा आज भी कायम है। परंतु समय के साथ नई पीढ़ी को न तो आशीर्वचन का महत्व पता है और नहीं सिर में धारण किए जाने वाले च्यूडे के संबंध में जानकारी । फिर भी पहाड़ के लोग इस प्राचीन परंपरा को आज भी बखूबी निभा रहे हैं। दरअसल आज के दिन भाइयों को च्यूडे पूजने बहन अपने ससुराल से मायके आती है। कुछ दिन पूर्व एक विशेष प्रकार के धान को पानी में भिगोकर पानी सहित एक पात्र में अपनी अपनी परंपरा के अनुसार कुछ दिनों के लिए रखा जाता है। फिर उन्हें तेल में भूना जाता है। तदुपरांत ओखली में कूट कर उनके छिलके साफ कर दिए जाते हैं। बाद में भाई दूज के दिन परिवार में सब इसे सिर में धारण करते हैं। बहनें अपने भाइयों के सिर में च्यूडे पूछते हैं। भाई बहन को दक्षिणा द्रव्य स्वरूप तथा अन्य उपहार प्रदान करते हैं। देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं संभाग में यह परंपरा आज भी कायम है। हमारे पहाड़ में जिनके बच्चे अन्य प्रदेशों में रहते हैं दीपावली में किन्ही कारणों से घर नहीं आ पाते उन्हें किसी न किसी माध्यम से च्यूडे उन तक पहुंचाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार आज के दिन यम भी अपनी बहन यमुना के घर गए इसलिए इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। आधुनिक युग में आज शहरीकरण होने के बाद लोग च्यूडे को भूलते जा रहे हैं। देवभूमि के कुछ गिनी चुनी जगहों पर जो ठेठ गांव हैं वही च्यूडे भिगोने और कूटने की परंपरा शेष बची है। ज्यादा सब गांव से च्यूडे मंगाकर अथवा बाजार में मशीनों द्वारा निर्मित च्यूडे का उपयोग करके अपनी इस प्राचीन परंपरा को भुलाने की ओर कदम बढ़ाए जा रहे हैं। कुछ लोग तो खिलों से ही यह काम कर दे रहे हैं। यदि यही स्थिति रही तो हमारी यह प्राचीन परंपरा मात्र इतिहास बनकर रह जाएगी और नई पीढ़ी च्यूडे किसे कहते हैं इस बात से भी अनभिज्ञ रहेगी। अतः हमें इस परंपरा को जीवित रखना नितांत आवश्यक है। सभी पाठकों को भाई दूज की ढेर सारी बधाइयां। लेखक श्री पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल (उत्तराखंड)

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