साहित्य

तबाही भरे अतीत से तंत्र ने नहीं लिया सबक

तबाही भरे अतीत से तंत्र ने नहीं लिया सबकडॉ० हरीश चन्द्र अन्डोलाउत्तराखंड प्राचीनकाल से ही…

उत्तराखंड की ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षण की दरकार

उत्तराखंड की ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षण की दरकारडॉ० हरीश चन्द्र अन्डोलादून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंडउत्तराखंड अपनी…

द्वादश ज्योर्तिलिंगों में एक जागेश्वर धाम

द्वादश ज्योर्तिलिंगों में एक जागेश्वर धामडॉ० हरीश चन्द्र अन्डोलादून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंडउत्तराखंड को देव भूमि…

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष को पड़ने वाली देवशयनी एकादशी का क्या है महत्व

देवशयनी एकादशी व्रत। हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष…

ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ लड़ने का संदेश देता हरेला लोक पर्व

डॉ० भरत गिरी गोसाई, सहायक प्राध्यापकवनस्पति विज्ञान, शहीद श्रीमती हंसा धनाई राजकीय महाविद्यालय अगरोड़ा, धारमंडल…

लोकपर्व ‘हरेला‘- ‘लाग हर्याव, लाग बग्वाल, जी रयै, जागि रयै, यो दिन बार भेटने रयै’

उत्तराखंड में हर ऋतु अपने साथ एक त्योहार भी लेकर आती हैश्रावण मास में पड़ने वाला ऐसा ही एक त्योहार है हरेला जो कि उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र का लोकप्रिय त्योहार है। यह त्योहार ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ किसानों और पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। हरेला पर्व उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र का सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय त्योहार है। हरेला पर्व से 10 दिन पहले घरों में थाली, मिट्टी व रिंगाल से बनी टोकरी में 7 प्रकार का अनाज बोया जाता है, जिसमें प्रत्येक दिन जल चढ़ाकर इसकी पूजा-अर्चना की जाती है और भगवान से परिवार  में सुख, समृद्धि और शांति बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है। मान्यता है कि जिसका हरेला जितना बड़ा होगा उसे कृषि में उतना ही लाभ होगा इसलिए इस दौरान किसान अपनी फसल की पैदावार का अनुमान भी लगाते हैं। इस दिन घर के बड़े-बुजुर्ग परिवार के सदस्यों के सिर पर हरेला के तिनके रखते हुए हुए उन्हें आशीर्वाद भी देते हैं। इसलिए इस त्योहार को खुशहाली और उन्नति का प्रतीक भी माना गया है। हरेला काटने से पूर्व कई तरह के पकवान बनाकर देवी देवताओं को भोग लगाने के बाद पूजन किया जाता है। हरेला पूजन के बाद घर परिवार के सभी लोगों को हरेला शिरोधारण कराया जाता है। इस मौके पर ‘लाग हर्याव, लाग बग्वाल, जी रयै, जागि रयै, यो दिन बार भेटने रयै’ शब्दों के साथ आशीर्वाद दिया जाता है। लोकपर्व ‘हरेला‘ आस्था का प्रतीक पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उत्तराखंड को भगवान शिव के निवास स्थान भी माना जाता है, जिसके कारण हरेला पर्व भगवान शिव के विवाह की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और उनके परिवार के सभी सदस्यों की मिट्टी से मूर्तियां बनाई जाती हैं। जिन्हें प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है। कुमाऊँ छेत्र में कई जगहों पर हरेला पर्व के दिन मेला भी लगता है। इस त्योहार को लेकर खास बात यह है कि जहाँ कोई भी त्योहार साल में एक बार ही आता है वहीं हरेला पर्व पूरे वर्ष में तीन बार अलग-अलग महीने (चैत्र, श्रावण और आषाढ़) में आता है। लेकिन श्रावण मास के पहले दिन पड़ने वाले हरेला का सबसे अधिक महत्त्व है क्योंकि श्रावण मास में भगवान शिव की विशेषकर पूजा की जाती है। प्रकृति संवर्धन और संरक्षण का प्रतीक हमारे पूर्वजों ने हमेशा से ही प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की सीख हमें दी है। हरेला पर्व हमारी संस्कृति और पर्यावरण के संगम को दर्शाता है। साथ ही हमें अपने पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण के संकल्प की याद भी दिलाता है। मान्यता है कि श्रावण मास में किसी भी वृक्ष की टहनी बिना जड़ के ही अगर जमीन में रोप दी जाय तो वह एक वृक्ष के रूप में ही बढ़ने लगती है। इसीलिए कई जगहों पर हरेला त्योहार के दिन विशेष रूप से फलदार वृक्ष लगाने के प्रचलन है, जो कि पर्यावरण के प्रति हमारी कर्तव्य निष्ठा और प्रकृति प्रेम को भी दर्शाता है। साथ ही यह त्योहार सामाजिक सद्भाव और सहयोग का पर्व है। पर्यटन मंत्री श्री सतपाल महाराज ने कहा ‘‘प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन उत्तराखंड की परंपरा का अहम हिस्सा रहा है। हरेला पर्व सुख, शांति और समृद्धि का प्रतीक होने के साथ-साथ सामाजिक सद्भाव और सहयोग का प्रतीक है। इसलिए आइये हरेला पर्व के सुअवसर पर हम अपने पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण का संकल्प लें और सामाजिक सद्भाव और सहयोग से इस कोरोना रूपी महामारी को दूर करने का संकल्प लें।’’ पर्यटन सचिव श्री दिलीप जावलकर ने कहा ‘‘हरेला पर्व हमारी संस्कृति और पर्यावरण के संगम को दर्शाता है। साथ ही हमें अपने पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण के संकल्प की याद भी दिलाता है। आइये अपने लोक पर्व और संस्कृति को आगे बढ़ाते हुए, हरेला पर्व के दिन ‘एक वृक्ष ज़रूर लगाएं।’’

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