कुमाऊं में पारंपरिक रीति रिवाज के अनुसार हरेला कब और कैसे बोयें आइये जानते हैं

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कब और कैसे बोयें हरेला जानिए? कुमाऊं में पारंपरिक रीति रिवाज के अनुसार हरेला बोया जाता है। अनेक श्रद्धावान लोगों का पंडितों से प्रश्न होता है की हरेला किस दिन बोया जाएगा? कुछ लोग बोने के नौवें दिन कुछ दसवे दिन और कुछ 11 दिन हरेला काटने का विधान पूर्व समय से निर्धारित रहता है। अतः जो लोग 11 वे दिन हरेला काटते हैं। वह 6 जुलाई को जो लोग 10 दिन में काटते हैं वह 7 जुलाई को और जो लोग नौवें दिन काटते हैं वह 8 जुलाई को इस बार हरेला बोयेंगे । इस बार 16 जुलाई 2021 को हरेला पर्व पड़ रहा है। इस दिन सूर्य देव मिथुन राशि को छोड़कर कर्क राशि में प्रवेश करते हैं। इसीलिए इसे कर्क संक्रांति भी कहते हैं। कुमाऊं में यह पर्व बड़े हर्षोल्लास के मनाया जाता है। कुमाऊं की प्राचीन रीति के अनुसार सर्वप्रथम मालू या तिमले के पत्तों वह घास के तिलों से हरेला बोने का पात्र बनाते हैं। जिसे कहीं खोपी या पूरा कहते हैं, यह जो पात्र बनाए जाते हैं। फिर उसमें शुद्ध स्थान की मिट्टी आधे आधे पात्रों में भरी जाती है। तदुपरांत घर के प्रत्येक सदस्य उसमें सात प्रकार के अनाज सप्तधान्य के बीजों को बोते हैं। मक्का उड़द गेहूं धान भट्ट जो चना आदि बीजों को एक साथ मिलाकर बोया जाता है। और फिर उसके ऊपर कुछ मिट्टी और डाली जाती है। ज्यादा नहीं मात्र बीजों को छुपाने लायक फिर इन पात्रों को घर के भीतर एक कोने में अथवा पूजा घर के कोने में अंधेरी जगह में रखा जाता है। कुमाऊं में कहीं घर की महिलाओं द्वारा उपवास रखकर भी हरेला बोया जाता है। अब आधुनिक युग में प्लास्टिक या अन्य पात्रों में हरेला बोया जा रहा है। जिसे नियम के विरुद्ध तो नहीं मान सकते हैं परंतु जहां तक संभव हो सके पत्तों से ही पात्र बनाए जाएं तो हमारी परंपरा में चार चांद लग जाते। क्योंकि यह पर्व प्रकृति के प्रति प्रेम का प्रतीक माना जाता है। इससे प्रकृति भी प्रश्न रहेगी। प्लास्टिक के पात्र जगह-जगह फैलने से प्रकृति प्रदूषित हो जाती है। हरेला बोने के बाद प्रत्येक दिन स्नान के बाद उसमें आवश्यकतानुसार पानी दिया जाता है। और हरेला पौधे उगाने के बाद सांकेतिक गुडाई की जाती है। और 16 जुलाई के दिन प्रातः स्नान के बाद पूजा घर में हरेला काटा जाता है। और सर्वप्रथम देवताओं को कुल इष्ट कुलदेवी को चढ़ाने के बाद घर के बूढ़े बुजुर्गों द्वारा छोटे बच्चों एवं घर के सभी सदस्यों की दीर्घायु की कामना के साथ पूजा जाता है। हरेला अंधेरे स्थान में इसलिए रखा जाता है कि उसका रंग पीला हो। पीला रंग संबंध संपन्नता एवं खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। हरेली के दिन लोग नए पौधे भी रोपते है, जी रया जागिर रया यो दिन यो मास भेटनै रया, दुब जास पनपी जया, अगास जास उच्च धरती जास चकाव है जया, सिंहक जस तराण स्यावक जसि बुद्धि हो, हिमांव में ह्यू रुण तक गंग जमुन में पाणि रूणी तलक जी रया जागि रया, अर्थात तुम जीते रहो जागरूक बने रहो। हरेले का यह दिन बार-बार आता रहे वंश परिवार डूब की तरह पनपता रहे। धरती जैसा विस्तार मिले आकाश की तरह उच्चता प्राप्त हो। सिंह जैसी ताकत और सियार की जैसी बुद्धि मिले। हिमालय में हिम रहने तक और गंगा जमुना में पानी बहने तक इस संसार में तुम बने रहो। पहाड़ के लोक पर्व हरेला पर जब सयानी और अन्य महिलाएं घर परिवार के सदस्यों को हरेला शिरोधार्य कराती हैं तो उनके मुख से आशीष की उक्त पंक्तियां बरबस उमड़ पड़ती है। लेखक पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल,

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