नौकरी छोड़ी, सिलबट्टा थामा और पहाड़ी स्वाद को बना दिया पहचान: हरीश बिष्ट की आत्मनिर्भरता की प्रेरक कहानी

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नैनीताल। उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति और पारंपरिक स्वाद को आधुनिक बाजार से जोड़ते हुए रामगढ़ विकासखंड के ग्राम नथुवाखान निवासी हरीश सिंह बिष्ट ने स्वरोजगार की ऐसी राह चुनी है, जो आज न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही है, बल्कि कई अन्य लोगों के लिए भी रोजगार और आय का माध्यम बन रही है। नौकरी छोड़कर अपने गांव लौटे हरीश बिष्ट ने स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक तरीकों को आधार बनाकर पहाड़ी सिलबट्टे पर पिसा हुआ मसाला युक्त नमक तैयार करने का व्यवसाय शुरू किया।

हरीश बिष्ट द्वारा तैयार किए जाने वाले इस विशेष पहाड़ी नमक में जीरा, हींग, लहसुन, अजवाइन, भांग दाना, जाखिया, भंगिरा, पुदीना, राई और सेंधा नमक जैसे पारंपरिक मसालों का प्रयोग किया जाता है। सिलबट्टे पर पीसने की पारंपरिक विधि इसके स्वाद और पहाड़ी पहचान को और खास बनाती है। स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी इसकी अच्छी मांग है।

हरीश बिष्ट ने बताया कि विभिन्न संस्थाओं में कार्य करने के दौरान उन्हें टिकाऊ खेती, पोषण वाटिका तथा हर्बल एवं ऑर्गेनिक उत्पादों के निर्माण और विपणन का अनुभव मिला। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर अपने गांव में ही स्वरोजगार को अपनाने का निर्णय लिया। वर्ष 2022 में उन्होंने पार्ट टाइम स्तर पर हर्बल एवं पहाड़ी उत्पादों के निर्माण और विपणन की शुरुआत की, जबकि वर्ष 2023 से इसे पूर्णकालिक व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाया।
सिलबट्टे पर तैयार पहाड़ी नमक के साथ वे बुरांश टी, हर्बल टी, बुरांश जूस, चटनी, रोजमेरी, तुलसी, थाइम, नेटल, ऑर्गेनो, कैमोमाइल, लेमन ग्रास, भांग दाना, मड़वा आटा, मल्टीग्रेन आटा और पहाड़ी दाल सहित कई स्थानीय एवं प्राकृतिक उत्पाद तैयार कर रहे हैं।
इन उत्पादों की मार्केटिंग नैनीताल, कैंची धाम, भीमताल, खुरपाताल, नौकुचियाताल, रामनगर, कौसानी, अल्मोड़ा, मुक्तेश्वर सहित 250 से अधिक पर्यटक स्थलों तक की गई है। अब कई ग्राहक घर से ही उत्पादों की मांग करते हैं तथा ऑनलाइन माध्यम से भी इन्हें मंगवा रहे हैं।

हरीश बिष्ट की यह यात्रा इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक ज्ञान को व्यवसाय से जोड़कर गांव में रहकर भी आत्मनिर्भर बना जा सकता है। वर्ष 2022 में जहां उनका कारोबार 10 हजार रुपये से भी कम था, वहीं निरंतर मेहनत, नए प्रयोग और बाजार से जुड़ाव के चलते आज उनका वार्षिक टर्नओवर लगभग 11 लाख रुपये तक पहुंच गया है।
इस सफलता की यात्रा में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) से मिली 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी महत्वपूर्ण रही। इस राशि से उन्होंने तौलने की मशीन, सीलिंग मशीन सहित आवश्यक उपकरण खरीदे, जिससे उत्पादों के निर्माण और पैकिंग को व्यवस्थित करने में मदद मिली।

आज हरीश बिष्ट अपने कार्य से लगभग 35 महिलाओं सहित कई लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से आय बढ़ाने में सहयोग दे रहे हैं। उनका मानना है कि यदि उत्तराखंड के प्रमुख पर्यटक स्थलों, रेलवे स्टेशनों, हवाई अड्डों, मॉल, म्यूजियम, सरकारी गेस्ट हाउस तथा अन्य प्रमुख स्थानों पर स्थानीय पहाड़ी उत्पादों के लिए बाजार और स्टॉल की बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए, तो इससे प्रदेश के अनेक ग्रामीण परिवारों को स्वरोजगार से जोड़ने के साथ-साथ उत्तराखंड के प्राकृतिक एवं पारंपरिक उत्पादों को देशभर में पहचान दिलाई जा सकती है।

हरीश बिष्ट की कहानी उत्तराखंड सरकार की आत्मनिर्भरता और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की सोच को धरातल पर साकार करती प्रेरक मिसाल है। उनका प्रयास दिखाता है कि पहाड़ की मिट्टी, पारंपरिक स्वाद और स्थानीय संसाधनों को सही दिशा और बाजार मिले तो गांव में रहकर भी सम्मानजनक रोजगार और बेहतर आय का सृजन किया जा सकता है।

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