तीन दिवसीय ’भारतीय हिमालयी क्षेत्र में संरक्षण शिक्षा को बढ़ावा देने के हेतु अभिमुखीकरण’ कार्यशाला 23 से 25 मार्च

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गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के जैव विविधता संरक्षण केन्द्र द्वारा ’सतत् विकास हेतु हिमालयी जैव विविधता का मुख्य धारा में समायोजन परियोजना के अन्तर्गत ’भारतीय हिमालयी क्षेत्र में संरक्षण शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए ज्ञान साधन व्यक्तियों का पुनः अभिमुखीकरण’ के लिए एक तीन दिवसीय कार्यक्रम का वेबिनार के माध्यम से सफल आयोजन 23 से 25 मार्च 2021को किया गया। इस वेबिनार का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय विद्यालयों में जैव विविधता और उसके सतत् उपयोग के प्रसार हेतु शिक्षको को पुनः अभिमुखित करना तथा उनके माध्यम से इस ज्ञान को विभिन्न क्षेत्रों में प्रचार-प्रसार करना है। कार्यक्रम का उद्घाटन संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. आई.डी. भट्ट ने सभी प्रतिभागी और सम्मानित अतिथियों का स्वागत करते हुए किया। तत्पश्चात उन्होने इस कार्यक्रम के नींव और उपयोग पर प्रकाश डाला उद्घाटन समारोह में संस्थान के निदेशक महोदय डाॅ. आर.एस. रावल भी उपस्थित थे। जिन्होनें इस कार्यक्रम के इतिहास और विभिन्न आयामों से भी प्रतिभागियांे को अवगत कराया। उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में डाॅ. राजेन्द्र डोभाल, महानिदेशक, यूकोस्ट भी वेबिनार के माध्यम से उपस्थित थे। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए डाॅ. डोभाल ने संरक्षण शिक्षा की आउटरीच को बढ़ाने के लिए सबसे पहले जैव विविधता तथा उसके संरक्षण की आवश्यकता को ज्ञान साधन व्यक्तियों से साझा करने की बात कही। उन्होंने जैव विविधता के संरक्षण हेतु सभी संस्थानों, स्कूलों, महाविद्यालयों और शोध संस्थानों को एकजुट होकर काम करने की बात कही।
उद्घाटन समारोह के समापन के पश्चात् तकनीकी सत्र की शुरूआत हुई जिसमें पहले दिन दो तकनीकी सत्र हुए। पहले सत्र में डाॅ. आई.डी. भट्ट ने जैव विविधता के अवलोकन पर प्रकाश डाला तत्पश्चात् दूसरे सत्र में डाॅ. विक्रम नेगी तथा आरोही संस्थान के डाॅ. पंकज तिवारी ने जैव विविधता के पारिस्थितिकीय महत्व तथा आर्थिक महत्व पर प्रकाश डाला। दूसरे दिन पुनः तकनीकी सत्र की शुरूआत हुई। इस दिन सबसे पहले संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. जी.सी.एस. नेगी ने जैव विविधता और पारिस्थितिकी का संबंध से सभी प्रतिभागियों को रूबरू कराया। तत्तपश्चात पारिस्थितिक मूल्यांकन, आनुवाशिंक विविधता, क्रियात्मक मूल्यांकन और आर.ए.-जी.आई.एस. का मूल्यांकन में योगदान पर क्रमशः डा. विक्रम नेगी, डाॅ. अरूण जुगरान, डाॅ. वीना पाण्डेय तथा डाॅ. देवेन्द्र कुमार ने संक्षिप्त प्रकाश डाला। तकनीकी सत्र तीन आगे बढाते हुए डाॅ. शैलजा पुनेठा (वैज्ञानिक) ने कृषि विविधता और डाॅ. गैरा ने जैव विविधता पर बढ़ रहे खतरे पर अपनी बात रखी।
विधिवत रूप से तीसरे दिन भी तकनीकी सत्र की शुरूआत हुई। इस दिन की शुरूआत करते हुए सर्वप्रथम डाॅ. जी.सी. कुनियाल वरिष्ठ वैज्ञानिक ने जलवायु परिवर्तन से होने वाली हाॅनि तथा इससे बचने के उपायों से सभी प्रतिभागियों को अवगत कराया। तत्पश्चात् तकनीकी सत्र को आगे बढ़ाते हुए डाॅ. सुमित पुरोहित (यू.सी.बी.) ने हाइड्रोपोनिक्स तथा एरोपोनिक्स विषय पर अपनी बात रखी तथा उन्होंने बताया कि किस प्रकार नई तकनीक से बिना मिट्टी के भी किसी भी फसल की उपज की जा सकती है। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए डाॅ. सुबोध ऐरी ने नर्सरी प्रबंधन तथा डाॅ. चन्द्रशेकर ने पौधों के स्वस्थाने संरक्षण पर प्रकाश डाला।
अंतिम तकनीकी सत्र में डाॅ. कनवाल ने पौधों के बिर्हिस्थाने संरक्षण तथा डाॅ. मिथिलेश सिंह ने जैव प्रौद्योगिकी का जैव विधिता संरक्षण में योगदान पर प्रकाश डाला। इस कार्यक्रम में उत्तराखण्ड के ग्यारह जिलों के लगभग 37 शिक्षकों ने प्रतिभाग किया। अध्यापकों द्वारा कार्यक्रम से लेकर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया तथा भविष्य में इस कार्यक्रम से जुडे रहने तथा इस तरह के कार्यक्रम की अवधि को बढ़ाने की मांग की तथा इस कार्यक्रम को विभागीय माध्यम तथा संस्थान के समन्वय से कराये जाने का सुझाव दिया। कार्यक्रम के अन्त में ऊधम सिंह नगर के मुख्य शिक्षा अधिकारी श्री रमेश चन्द्र आर्या भी जुडे और उन्होने इस कार्यक्रम को भविष्य में कराये जाने की उम्मीद संस्थान से की। समापन समारोह में संस्थान के निदेशक महोदय डाॅ. आर.एस. रावल उपस्थित थे उन्होंने सभी को होली की शुभकामना देते हुए इस तरह के कार्यक्रम को भूमि से जोड़ने का आश्वासन दिया तथा आगे के कार्यक्रम में जो भी त्रुटिया रह गयी है उसके निवारण पर जोर दिया। अन्त में डाॅ. वीना पाण्डेय ने सभी का धन्यवाद दिया तथा कार्यक्रम में संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. जी.सी. कुनियाल डाॅ. आई.डी. भट्ट, डाॅ. सुबोध ऐरी. डाॅ. मिथिलेश सिंह, डाॅ. विक्रम सिंह नेगी तथा संस्थान शोधार्थी डाॅ. वीना पाण्डेय, रवि पाठक, दीपचन्द्र पाण्डे, बंसत सिंह तथा अजय सिंह उपस्थित थे।

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