मार्गशीर्ष पूर्णिमा और दत्तात्रेय जयंती का क्या है महत्व आइये जानते हैं एक रहस्यमय कथा

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दत्तात्रेय जयंती का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस वर्ष सन 2021 में दत्तात्रेय जयंती अथवा मार्गशीर्ष पूर्णिमा दिनांक 18 दिसंबर दिन शनिवार को है। इस दिन शुभ योग प्रातः 9:00 बज कर 15 मिनट से प्रारंभ होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूर्णिमा तिथि माता लक्ष्मी को अत्यधिक प्रिय है। इसीलिए तो कोजागिरी पूर्णिमा पर माता लक्ष्मी धरती पर विचरण करती है। पूर्णिमा की रात चंद्रदेव अपने 16 कलाओं से परिपूर्ण होते हैं। पूर्णिमा के दिन व्रत रखने और पवित्र नदियों में स्नान करने से पुण्य लाभ मिलता है। आज मैं प्रिय पाठकों को कुछ ज्योतिषी उपायों को करके माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के महत्वपूर्ण उपाय बताना चाहूंगा। जिससे धन सौभाग्य के साथ आप पर माता लक्ष्मी की भी अति कृपा होगी आइए जानते हैं इसके बारे में। उपाय नंबर 1– मार्गशीर्ष पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी की विधि विधान से पूजा करें माता लक्ष्मी को 11 कौड़िया अर्पित करें। उस पर हल्दी का तिलक करें उसे पूर्ण रात माता लक्ष्मी के चरणों में रहने दे। तदुपरांत दूसरे दिन उन्हें कपड़े में बांधे और तिजोरी में रख दें। इससे आपके धन एवं सौभाग्य में वृद्धि होगी। माता लक्ष्मी की कृपा भी बनी रहेगी। उपाय नंबर दो– पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी को पूजा के समय सुपारी अवश्य चढ़ाएं फिर उस सुपारी में रक्षा सूत्र लपेट दें रक्षा सूत्र का अभिप्राय कलावा से है। कुछ समय बाद उसे तिजोरी में रख ले ऐसा उपाय करने से आप के धन में वृद्धि होगी बरकत होगी आपके पास धन स्थिर रहने लगेगा। उपाय नंबर 3– मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन पीपल के पेड़ की पूजा करने की परंपरा भी है। ऐसी मान्यता है कि पीपल के पेड़ में सभी देवी देवताओं का वास होता है। उपाय नंबर 4– पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए उनके मंत्रों का जाप भी कर सकते हैं। ऐसा करने से अभीष्ट मनोकामना की सिद्धि हो सकती है। उपाय नंबर 5– पूर्णिमा का व्रत रखने और इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा किसी सुयोग्य ब्राह्मण से करवाने से एवं सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने का भी महत्व होता है। सत्यनारायण भगवान को भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना जाता है। इस दिन आप भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की एक साथ पूजा करके अपने सुखमय पारिवारिक जीवन की कामना कर सकते हैं। श्रीमद भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने मार्गशीर्ष माह को स्वयं का महीना बताया है। इस पूरे माह भगवान श्री कृष्ण की पूजा आराधना की जाती है। मान्यता है कि मार्गशीर्ष माह के दिन सत्यनारायण भगवान की कथा का श्रवण किया जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा का भी विधान है मात्र इतना ही नहीं इस दिन चंद्रमा की भी आराधना की जाती है। अब मैं प्रिय पाठकों को मार्गशीर्ष पूर्णिमा के शुभ मुहूर्त की जानकारी देना चाहूंगा। पंचांग के अनुसार इस वर्ष सन् 2021 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा अथवा दत्तात्रेय जयंती दिनांक 18 दिसंबर दिन शनिवार को प्रातः 7:24 से प्रारंभ होकर अगले दिन दिनांक 19 दिसंबर दिन रविवार को प्रात है 10:05 पर समाप्त होगी। ऐसे में मार्गशीर्ष पूर्णिमा 18 दिसंबर को मनाई जाएगी इस बार मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर शुभ योग बन रहे हैं। दिनांक 18 दिसंबर को साध्य योग प्रातः है 9:13 तक है इसके बाद शुभ योग ही रहेगा तत्पश्चात शुभ योग पूर्णिमा तिथि तक बना रहेगा। इस दिन चंद्रोदय शाम 4:46 पर होगा इस दिन रोहिणी नक्षत्र 16 घड़ी 45 पल तक रहेगा तदुपरांत मृगशिरा नक्षत्र प्रारंभ होगा । अब प्रिय पाठकों को भगवान दत्तात्रेय की कथा के संबंध में बताना चाहूंगा। परम भक्त वत्सल दत्तात्रेय भक्तों के स्मरण करते ही तुरंत उसके पास पहुंच जाते हैं। वैसे तो मार्गशीर्ष का महीना विवाह पंचमी गीता जयंती मोक्षदा एकादशी आदि विशेष पर्वों के कारण महत्व तो रखता ही है साथ ही इस महीने की पूर्णता दत्तात्रेय जयंती के रूप में पूर्णमासी को होने के कारण विशेष महत्व रखता है। हमारे सनातन धर्म उपासना एवं सन्यास धर्म में दत्तात्रेय भगवान का विशेष महत्व है। इन सबके अतिरिक्त इस दिन सन्यासियों के अखाड़ों में विशेष आध्यात्मिक प्रवचन भी चलते हैं जिससे आराधना और साधना से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। महा योगेश्वर दत्तात्रेय भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनका अवतरण मार्गशीर्ष पूर्णिमा को प्रदोष काल में हुआ था अतः इस दिन समारोह पूर्वक दत्त जयंती का उत्सव मनाया जाता है। श्रीमद्भागवत में लिखा है कि पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महर्षि अत्रि के व्रत करने पर”दत्तो मयाहमिति यद् भगवान स दत्त:” मैंने अपने आप को तुम्हें दे दिया है विष्णु के ऐसा कहने से भगवान विष्णु ही अत्रि के पुत्र रूप में अवतरित हुए और दत्त कहलाए। अत्रिपुत्र होने से यह आत्रेय कहलाते हैं। दत्त और आत्रेय के संयोग से इनका नाम दत्तात्रेय प्रसिद्ध हो गया। इनकी माता का नाम अनसूया है। उनका पतिव्रता धर्म संसार में प्रसिद्ध है। पुराणों में यह कथा भी आती है कि एक बार ब्रह्माणी रुद्राणी और लक्ष्मी को अर्थात माता सरस्वती माता पार्वती एवं माता लक्ष्मी को अपने पतिव्रत धर्म पर गर्व हो गया। भगवान को अपने भक्तों का अभिमान सहन नहीं होता तब उन्होंने एक अद्भुत करने की सोची। भक्तवत्सल भगवान ने देवर्षि नारद के मन में प्रेरणा उत्पन्न की। नारद जी घूमते घूमते देव लोक पहुंचे और तीनों देवियों के पास बारी बारी से जाकर कहा पति-पत्नी अनुसूया के समक्ष आप को सतीत्व नगण्य है । तीनों देवियों ने अपने स्वामियों अर्थात ब्रह्मा विष्णु एवं महेश से देवर्षि नारद की यह बात बताई और उनसे अनुसूया के पतिव्रता की परीक्षा करने को कहा। देवताओं ने बहुत समझाया परंतु उन देवियों के हट के सामने उनकी एक न चली। अंततः साधु वेश बनाकर वे तीनों देव अत्रि मुनि के आश्रम में पहुंचे। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। अतिथियों को आया हुआ देख देवी अनुसूया ने उन्हें प्रणाम कर और यह कंदमूल आदि अर्पित किए किंतु यह बोले हम लोग तब तक आतिथ्य स्वीकार नहीं करेंगे जब तक आप हमें अपने गोद में बिठाकर भोजन नहीं कराती। यह बात सुनकर सर्वप्रथम तो देवी अनुसूया अवाक रह गई किंतु अतिथि धर्म की महिमा का लोप न हो इस दृष्टि से उन्होंने नारायण का ध्यान किया। अपने पतिदेव का स्मरण किया और इसे भगवान की लीला समझकर वह बोली यदि मेरा पतिव्रता धर्म सत्य है तो यह तीनों साधु छह छह माह के शिशु हो जाए इतना कहना ही था कि तीनों देव छह छह मास के शिशु बन गए। और रुदन करने लगे। तब माता ने उन्हें गोद में लेकर दुग्ध पान कराया। फिर पालने में झुलाने लगी। ऐसे ही कुछ समय व्यतीत हो गया। इधर देवलोक में जब तीनों देव वापस ना आए तो तीनों देवियां अर्थात मां सरस्वती मां पार्वती एवं मां लक्ष्मी अत्यंत व्याकुल हो गई। फलता:नारद वहां आए और उन्होंने संपूर्ण वृतांत कह सुनाया। तीनों देवियां अनसूया के पास आई और उन्होंने उनसे क्षमा मांगी। देवी अनुसूया ने अपने पतिव्रत से तीनों देव को पूर्व रूप में कर दिया। इस प्रकार प्रसन्न होकर तीनों देवों ने अनुसुइया से वर मांगने को कहा तो देवी बोली आप तीनों देव मुझे पुत्र रूप में प्राप्त हो। तथास्तु कहकर तीनों देवों और देवियां अपने लोक को चले गए। कुछ समय बाद यही तीनों देव अनुसूया के गर्भ से प्रकट हुए। ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा शंकर के अंश से दुर्वासा तथा विष्णु के अंश से दत्तात्रेय श्री विष्णु भगवान के ही अवतार हैं और इन्हीं के आविर्भाव की तिथि दत्तात्रेय जयंती कहलाती है।

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