आश्रम’गांधी की यादों को समेटे है कौसानी का अनासक्ति आश्रम

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उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का एक छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत कस्बा है कौसानी। एक दौर में यहां की खूबसूरती पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी मोहित हो गए थे। उन्होंने इसे भारत के स्विटजरलैंड की संज्ञा दी थी और यहीं पर बना है अनासक्ति आश्रम। प्राकृतिक सौंदर्य और रमणीक स्थान पर बना यह आश्रम बापू के जिला भ्रमण के दौरान प्रवास स्थली बना। आज यह आश्रम उनकी कई यादों को तस्वीरों में समेटे हुए है। यहां के संग्रहालय में उनके जीवनकाल के 150 श्वेत श्याम छायाचित्र मौजूद हैं। जो यहां आने वालों को उनके जीवन को जानने, समझने और महसूस करने का मौका देते हैं।1929 में भारत भ्रमण के बाद थकान मिटाने के लिए महात्मा गांधी जून माह के दूसरे पखवाड़े में दो दिन के प्रवास के दौरान कौसानी पहुंचे। यहां की मनमोहक वादियां और हिमालय की पर्वत-श्रृंखलाओं के दर्शन कर वह मोहित हो गए। उस समय वह यहां पूरे 14 दिन तक रुके। इस दौरान उन्होंने गीता पर आधारित योग अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘अनासक्ति योग’’ की प्रस्तावना लिखी थी। जब गांधी जी यहां आए थे तब इस स्थान पर किसी अंग्रेज के चाय रखने का स्टोर बना था। उसे बाद में जिला पंचायत का डाक बंगला बना दिया गया।1963 में जब सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने इस स्थान को महात्मा गांधी की यादों को तरोताजा रखने के लिए गांधी स्मारक निधि को सौंप दिया। उन्होंने इसे आश्रम का रूप दिया और इसका नामकरण गांधी की पुस्तक अनासक्ति योग के आधार पर अनासक्ति आश्रम रखा। वर्तमान में आश्रम सैलानियों, शोधकर्ताओं, दार्शनिकों, आध्यात्मिक सहित स्थानीय लोगों के लिए बापू के जीवन वृत्त को जानने का सबसे अहम केंद्र है।कौसानी के अनासक्ति आश्रम में बापू के जीवनकाल से जुड़े 150 दुर्लभ श्वेत-श्याम छायाचित्र मौजूद हैं। इनमें 1887 से 1891 के दौरान इंग्लैंड में बैरिस्टर की पढ़ाई के दौरान से लेकर उनकी अस्थियों के विसर्जन तक की यादें जुड़ी हैं। यहां रखी प्रमुख तस्वीरों में 1906 में दक्षिण अफ्रीका में चला अहिंसात्मक सत्याग्रह आंदोलन, 12 मार्च से छह अप्रैल 1930 तक चली डांडी यात्रा और नमक कानून तोड़ने, 1931 के गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी, 1939 में कुष्ठ रोगियों की सेवा करते हुए हैं।इसके अलावा आगा खां महल में गांधी, शांतिनिकेतन में रविंद्र नाथ टैगोर के साथ, रामगढ़ में कांग्रेस अधिवेशन, जलियांवाला बाग, लंदन में मित्रों के साथ नौआखली यात्रा, राउंड टेबल कांफ्रेंस, बिरला हाउस की प्रार्थना सभा, बिहार में दंगों के बाद का दौर, आनंद भवन, एशियन रिलेशंस कांफ्रेंस में भाषण सहित लार्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नी के साथ खींची गई दुर्लभ तस्वीरें भी यहां मौजूद हैं।अनासक्ति आश्रम में स्थित तस्वीरों में राष्ट्रपिता के बाल्यकाल से लेकर अंतिम यात्रा तक के दर्शन होते हैं लेकिन इस कलेक्शन को खास बनाती है बा और बापू की तस्वीर। संग्रहालय में प्रवेश करते ही बांयी दीवार पर टंगी महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी की दुर्लभ तस्वीर है। जो यहां आने वालों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करती है। अनासक्ति आश्रम की देखरेख का जिम्मा संभालने वाले गांधी स्मारक निधि के कार्यकारिणी सदस्य बताते हैं कि कौसानी को गांधी ग्राम घोषित हुआ था। उस समय गांधी स्मारक निधि ने संग्रहालय में उनके जीवन से जुड़ी 201 तस्वीरों का उपलब्ध कराया। वर्तमान में 150 फोटो ही रह गई हैं। इन्हें संग्रहालय की दीवारों पर आगंतुकों के दर्शनार्थ सहेजकर रखा गया है। 1929 में महात्मा गांधी कुमाऊं की यात्रा पर आए। कुली बेगार प्रथा के खिलाफ चले आंदोलन की सफलता देखकर ही पहली बार बापू यहां पहुंचे थे। उनका उद्देश्य क्षेत्रीय स्तर पर राष्ट्रीय अांदोलन को मजबूती प्रदान करना था। 22 दिनों की अपनी इस यात्रा में उन्होंने कुमाऊं के 26 जगहों पर भाषण दिया। मगर अधिकांश समय कौसानी में गुजारा। इस यात्रा के बाद कौसानी का डाक बंगला बापू की यादों का संग्रहालय बन गया। कुमाऊं के स्वतंत्रता सेनानी यहां आकर प्रेरणा और शक्ति लेते। आज भी यह जगह बापू के होने का अहसास कराता है। बापू कुमाऊं की दूसरी यात्रा में 18 मई 1931 को नैनीताल पहुंचे। कुमाऊं कमिश्नरी के तत्कालीन तीन जिलों नैनीताल, अल्मोड़ा व ब्रिटिश गढ़वाल ( पौड़ी) के कांग्रेस कार्यकर्ताओं का सम्मेलन भी आयोजित किया। यह कुमाऊं परिषद के 1926 में कांग्रेस में विलय होने के बाद पहला बड़ा राजनीतिक सम्मेलन था। गांधीवादी विचारक कहते हैं कि महात्मा गांधी ने कुमाऊं में आजादी की अलख जगाई। आने वाली पीढिय़ां भी उनका संदेश याद रखेंगी। बागेश्वर प्रवास के दौरान जीत सिंह टंगडिया ने बापू को स्वनिर्मित चरखा भेंट किया। इस चरखे की विशेषता थी कि वह कम समय में ज्यादा ऊन कात लेता था। वर्धा पहुंचने के बाद बापू ने विक्टर मोहन जोशी को पत्र लिखकर एक और चरखा मंगवाया, जिसे नाम दिया बागेश्वरी चरखा। जीत सिंह ने बाद में उस चरखे में और बदलाव किया, जो कताई के साथ ही बटाई भी कर लेता था। 1934 में तो उन्होंने घर में चरखा आश्रम की ही स्थापना कर दी। अंग्रेजी ताकत से देश को स्वतंत्र कराने की बढ़ती छटपटाहट का दौर। एक तरफ विरोध की हिंसक अभिव्यक्ति तो दूसरी ओर अहिंसक प्रतिकार। महात्मा गांधी ने जब अहिंसा को हथियार बनाया तो इसकी एक प्रयोगशाला कुमाऊं भी रहा। बापू ने कौसानी को कर्मस्थली बनाया और देखते-देखते पूरे कुमाऊं में अहिंसा एक आंदोलन बन गई। महात्मा गांधी के विचारों ने, उनके भावी सपनों ने और बगैर कोई हथियार थामे आंदोलन में कूदने की प्रेरणा ने लोगों में इतनी ऊर्जा भरी कि उन्होंने लाठियां खाईं, जेल गए, मगर स्वाधीनता पाने का हौसला नहीं खोया। कौसानी से बहुत सी यादें जुड़ी हैं। प्राकृतिक खूबसूरती से भरे इस इलाके को महात्मा गांधी ने ही भारत का मिनी स्विट्जरलैंड कहा था। यहीं रहते हुए बापू को अनासक्ति योग पुस्तक लिखने की प्रेरणा भी मिली। आजादी की चेतना जगाने के लिए कुमाऊं के कई इलाकों में महात्मा गांधी घूमे। लेकिन कौसानी उनको इतना भाया कि उन्होंने यहां लंबा प्रवास किया। बापू 24 जून 1929 को कौसानी पहुंचे और 7 जुलाई तक यहां रुके। 14 दिन के इस प्रवास के दौरान कुमाऊं में आजादी के आंदोलन को जो धार मिली, वह बढ़ती चली गई। सल्ट से लेकर बौरारो घाटी तक, नैनीताल से लेकर पिथौरागढ़ तक आजादी की मांग की आवाज मुखर होती गई। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा उस समय बुलंद था और इसमें कुमाऊं ने भी अपनी आवाज मिलाई। उस समय जिस आजादी की चेतना का प्रसार हुआ, वह आज तक लोगों को ताकत दे रही है। यहीं पर महात्मा गांधी ने गीता के उपदेशों को सरल शब्दों में उकेरने का भी काम किया। सबसे खास बात यह है कि बापू की कुमाऊं में सर्वाधिक यादों को समेटने वाला कौसानी ही है। जिस जगह वह रहे, उसे अब अनासक्ति आश्रम के नाम से जाना जाता है। महात्मा गांधी सादा जीवन जीवन उच्च विचार को मानने वाले व्यक्ति थे। उनके इसी स्वभाव की वजह से उन्हें लोग महात्मा करकर पुकारते थे। गांधीजी प्रजातंत्र के बहुत बड़े समर्थक थे और अपना हथियार सत्य और अहिंसा को कहा करते थे। इन्हीं दो हथियारों के बल पर उन्होंने भारत को अंग्रेजों से आजाद कराया था। गांधीजी ऐसे व्यक्तितिव के धनी थे कि उनसे जो भी मिलता था वो पहली ही बार में बहुत प्रभावित हो जाता था। गांधी जी ने समाज में फैली छुआछूत की की भावना को दूर करने के लिए बहुत प्रयास किए। उन्होंने पिछड़ी जातियों को ईश्वर के नाम पर हरि-जन नाम दिया और जीवनभर उनके उत्थान के लिए प्रयासरत रहे। डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरतहैं।

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