राष्ट्रीय शिक्षा नीति को धरातल पर उतारने में कोरोना काल

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति को धरातल पर उतारने में कोरोना काल
डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
देश की नई शिक्षा नीति के संकल्प के अनुकूल भारत सरकार का मानव संसाधन विकास मंत्रालय अब “शिक्षा मंत्रालय” के नाम से जाना जायगा. इस पर राष्ट्रपति जी की मुहर लग गई है और गजट भी प्रकाशित हो गया है. इस फौरी कारवाई के लिये सरकार निश्चित ही बधाई की पात्र है. यह कदम भारत सरकार की मंशा को भी व्यक्त करता है. पर सिर्फ मंत्रालय के नाम की तख्ती बदल देना काफी नहीं होगा अगर शेष सब कुछ पूर्ववत ही चलता रहेगा. आखिर पहले भी शिक्षा मंत्रालय का नाम तो था ही. स्वतंत्र भारत में मौलाना आजाद, के एल श्रीमाली जी, छागला साहब, नुरुल हसन साहब और प्रोफेसर वी के आर वी राव जैसे लोगों के हाथों में इसकी बागडोर थी और संसद में पूरा समर्थन भी हासिल था. सितम्बर 1985 में जब ‘मानव संसाधन’ का नामकरण हुआ तो श्री पी वी नरसिम्हा राव जी प्रधानमंत्री थे और इस मंत्रालय को भी खुद सभाल रहे थे. वे विद्वान, कई भाषाओं के जानकार और लेखक भी थे. अतएव भारत में शिक्षा की समस्याओं से परिचित न रहे हों ऐसा नहीं कहा जा सकता.गौर तलब है कि विभिन्न आयोगों, समितियों और शोध कार्यों में शुरू से ही शिक्षा की दुर्दशा पर चर्चा होती रही है और गुणात्मक सुधार की जरुरत पर आम सहमति रही है. इसके लिये सुधार लाने में संसाधन की कमी का हवाला दिया जाता रहा है. इन सब सीमाओं के बावजूद शिक्षा का संबर्धन करने के लिये कुछ न कुछ होता रहा और शिक्षा का आख्यान आगे चलता रहा. चूंकि शिक्षा सभ्य जीवन में एक जरूरी कवायद है इसलिए उसे रोका नहीं जा सकता इसलिए शिक्षा के नाम पर संस्थाओं को खोला जाता रहा और निजीकरण को बढावा दिया गया. सरकारी विद्यलय और अन्य संस्थान कमजोर होते गए. इन सबसे शिक्षा में भी वर्ग (क्लास) बनते गए और उसका लाभ अधिकतर उच्च और मध्य वर्ग को मिला. चिन्ता व्यक्त करते रहने के बावजूद शिक्षा की प्रक्रिया की समझ और उसमें बदलाव को लेकर गंभीरता नहीं आ सकी. वह सरकारी एजेण्डे में वरीयता नहीं पा सकी. जब कभी इस तरह की कोशिश की गई तो राजनीति की छाया हाबी होती रही. शिक्षा की विसंगतियों से हम उबर नहीं सके. ऐसे में कुछ अपवाद की संस्थाएं तो बची रहीं और उनकी स्वायत्तता और राजनीतिमुक्तता से उनकी गुणवत्ता भी विश्वस्तरीय बनी रही. शेष अधिकांश संस्थाएं आज त्राहि माम कर रही हैं. शिक्षा सर्वांगीण हो इसके लिये शिक्षा को प्रासंगिक, सृजनात्मक, जीवनोपयोगी और सामर्थ्यवान बनाने के लिए प्रयास करना होगा. अत: ज्ञान , कौशल और अनुभव सबको महत्व देना होगा. शिक्षा में अध्ययन के अवसर रूढ़िबद्द्ध न हो कर व्यापक और उन्मुक्त करने वाले होने चाहिए. विषयों के बंधन कं करने होंगे. लोक तंत्र की आकांक्षा के अनुरुप उसे समावेशी बनाना होगा ताकि सब की भागीदारी हो सके. मातृभाषा नें आरंभिक शिक्षा होनी चाहिए. साथ ही बहुभाषिकता को बढावा देना होगा. बच्चों के लिये पोषण की आवश्यकता है. संरचनात्मक ढांचे को पुष्ट करना आवश्यक है. शिक्षा संस्थानों को स्वायत्तता मिलनी चाहिए. शिक्षक प्रशिक्षण को सुदृढ करना होगा. शिक्षा का समाज की अन्य संस्थाओं के साथ संवाद होना चाहिए. स्थानीय स्तर पर सन्वेदना और कार्य का अवसर मिलना चाहिए. समाज में जड़ता की जगह आशा का मनोभाव लाना भी आवश्यक होगा. दुर्भाग्य से शिक्षा तंत्र और उसकी नौकरशाही आज कुटिल होती गई है उसे तब्दील करना बेहद मुश्किल पर जरूरी है. सारी कोशिशों के बावजूद कई विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति वर्षों से नहीं हुई है पर प्रवेश और परीक्षा का क्रम जारी है. हम कहाँ पर खड़े हैं उसकी वस्तुस्थिति का आकलन करना आवश्यक है. क्षेत्रवाद, जातिवाद, परिवारवाद और भ्रष्ट आचरण आदि के कारण अनेक संस्थाए रुग्ण होती गई हैं. साथ ही शिक्षा अपने परिवेश से भी प्रभावित होती है. बाजार, मीडिया और व्यापक घटनाक्रम उसे भी प्रभावित करता है. पर शिक्षा से अपेक्षा है विवेक के लिये और जो अकल्याणकर है उसका प्रतिरोध करते हुए नए-नए सपने बुनने की. इनकी जगह तो शिक्षा केन्द्र हैं. इनमें विचार के स्वराज की संभावना को आकार देना होगा. नई शिक्षा नीति में इसके अवसर हैं. उन पर अमल करने की जरुरत है. शुरुआती दौर में उन लोगों ने शिक्षा संस्थान खोलने में रुचि दिखाई, जो वास्तव में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ करना चाहते थे, लेकिन बाद में वे लोग भी इसमें शामिल हो गए जिनका उद्देश्य शिक्षा की आड़ में केवल मुनाफा कमाना था। और इसी वजह से बीतते समय के साथ शिक्षण संस्थानों ने अधिक से अधिक पैसे कमाने को लेकर अपनी पैठ को इतना खराब कर दिया है कि शिक्षा और शिक्षण इनका प्रमुख लक्ष्य नहीं रहा। आज स्थिति यह है कि शिक्षा को व्यवसाय बना दिया गया है और शिक्षण को बाजारीकरण। विडंबना यह भी कि लोगों को इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है। स्थानीय जटिलताएं और हस्तक्षेप के चलते शैक्षिक संस्कृति में मूल्यों का सतत ह्रास चिंता का विषय होता जा रहा है। प्रचलित पाठ्यक्रमों की पसंद के पीछे लुभावनी नौकरी की संभावना की ही निर्णायक भूमिका हो रही है। अप्रासंगिक और भारतीय ज्ञान परंपरा से दूर पाठ्यक्रम ऐसे स्नातक तैयार कर रहा है जो जड़ों से कटे हुए हैं और जिनका मूल्य बोध वैश्विक अर्थात आर्थिक कसौटियों को ही प्रासंगिक मानता है। शिक्षा भविष्य की तैयारी होती है। इसलिए उसे नए भारत की संभावनाओं के लिए आधार बनाना ही होगा। इसके तहत पैरा-टीचर्स जैसे कि अतिथि शिक्षक, शिक्षामित्र इत्यादि की नियुक्ति बंद करने का सुझाव दिया गया है. मौजूदा समय में सरकारें चंद पैसे देकर इस तरह के शिक्षकों को कुछ दिन के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर रखकर बच्चों को पढ़ाने का काम करती आ रही हैं. इन सबके अलावा शिक्षा के वैश्वीकरण पर भी जोर दिया गया है. इस शिक्षा नीति में कहा गया है कि भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को अपनी शाखाएं बनाने का मौका दिया जाएगा.इस प्रस्ताव को लेकर आलोचकों ने संदेह जताया है कि इसके जरिये स्वदेशी सरकारी शिक्षण संस्थानों के लिए खतरा पैदा हो सकता है, क्योंकि सत्ता और इस तरह के विश्वविद्यालयों के गठजोड़ से सरकारी संस्थानों के महत्व को खत्म करने की कोशिश की जा सकती है.इसके अलावा इस नई शिक्षा नीति में भी पिछले 50 सालों से की जा रही उस सिफारिश को फिर से दोहराया गया है कि देश की जीडीपी का छह फीसदी शिक्षा में खर्च किया जाना चाहिए. प्रधानमंत्री ने एक वर्ष में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को धरातल पर उतारने में कोरोना काल के दौरान शिक्षकों ने काफी मेहनत की है. उन्होंने कहा कि कोरोना काल में भी शिक्षा नीति पर काफी काम हुआ है. नई शिक्षा नीति के जरिए नए भविष्य का निर्माण होगा. इस दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि आठ राज्यों में 14 इंजीनियरिंग कॉलेज पांच भारतीय भाषाओं-हिंदी, तमिल, तेलुगू, मराठी, बांग्ला में पाठ्यक्रम शुरू करने जा रहे हैं.उन्होंने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को एक साल पूरा होने पर सभी देशवासियों और सभी विद्यार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि बीते एक वर्ष में देश के आप सभी महानुभावों, शिक्षको, प्रधानाचार्यों, नीतिकारों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को धरातल पर उतारने में बहुत मेहनत की है. उन्होंने कहा कि भविष्य में हम कितना आगे जाएंगे, कितनी ऊंचाई प्राप्त करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि हम अपने युवाओं को वर्तमान में यानि आज कैसी शिक्षा दे रहे है, कैसी दिशा दे रहे हैं
लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभ

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