कितनी महत्वपूर्ण है गीता जयंती? जाने पूजा विधि शुभ मुहूर्त एवं कथा

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कितनी महत्वपूर्ण है गीता जयंती? जाने पूजा विधि शुभ मुहूर्त एवं कथा।,,,,,,,,, श्रीमद भगवत गीता हिंदू धर्म का सबसे पवित्र महा ग्रंथ है। महाभारत के युद्ध में जब धनुर्धर अर्जुन अपने लक्ष्य से विचलित हो गए थे और युद्ध के दौरान अस्त्र शस्त्र उठाने से मना कर रहे थे। तब नंदनंदन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने मार्ग पर वापस लाने के लिए गीता का उपदेश दिया था। द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन धनुर्धर अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसलिए इस तिथि को गीता जयंती मनाई जाती है। श्रीमद भगवत गीता हमारे हिंदू धर्म का सबसे पवित्र ग्रंथ माना जाता है। यह भारतीय संस्कृति की प्रमाणिक आधारशीला है। श्रीमद भगवत गीता में कुल मिलाकर 700 श्लोक हैं जो कि 18 पर्व मैं हैं। इस महान ग्रंथ की रचना भी महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई थी। इसमें लेखन का कार्य भगवान श्री गणेश जी के द्वारा किया गया। श्रीमद भगवत गीता को भगवान गणेश जी के द्वारा लिखने के पीछे भी एक महत्वपूर्ण कथा है। महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद भगवत गीता को अंतर्मन में रख लिया था परंतु उनके सामने एक गंभीर समस्या यह थी कि वह इसे लिखना चाहते थे उन्हें ऐसे विद्वान की आवश्यकता थी कि वह भागवत का उच्चारण बिना कहीं रुके करते जाए और विद्वान लेखक उसका लेखन का कार्य बिना रुके और बिना किसी त्रुटि के कर सके। इस समस्या का समाधान पाने के लिए महर्षि वेदव्यास जी ने ब्रह्मा जी के समक्ष अपनी समस्या को रखा। ब्रह्मा जी ने महर्षि विद्या से कहा की वह इस कार्य में है बुद्धि के देवता भगवान श्री गणेश जी की मदद लें। व्यास जी गणेश जी के पास पहुंचे और उन्होंने अपने विचार भगवान गणेश जी के समक्ष रखे। भगवान गणेश जी महर्षि व्यास की परेशानी को सुनकर महाभारत को भी लिखने के लिए राजी हो गए। उन्होंने एक शर्त रखी कि एक बार कलम उठा देने के बाद कथा समाप्त होने तक वह बीच में कहीं नहीं रुकेंगे। महर्षि व्यास गणेश जी की विद्वता को समझ गए कि यदि यह शर्त मान लेते हैं तो उन्हें बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। उन्हें बिना किसी विश्राम के निरंतर महाभारत का वाचन करना पड़ेगा। महर्षि वेदव्यास जी ने भी गणेश जी के समक्ष एक शर्त यह रखी कि हर श्लोक लिखने के बाद गणेश जी को उसका अर्थ समझाना होगा। भगवान श्री गणेश जी ने ऋषि वेदव्यास की शर्तें मान ली। महर्षि वेदव्यास वाचन करते और गणेश जी लेखन का कार्य करते हैं। गणेश जी द्वारा श्लोक का अर्थ समझाने के दौरान महर्षि वेदव्यास ने नए श्लोक की रचना कर लेते। इस प्रकार महाभारत की रचना हुई। श्रीमद्भगवद्गीता मात्र हमारे देश में ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों में अनेकों विद्वानों ने भी इसका अध्ययन किया है। विश्व के बहुत से वैज्ञानिकों ने श्रीमद्भागवत गीता पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। उदाहरणार्थ अल्बर्ट आइंस्टाइन । अल्बर्ट आइंस्टाइन के अनुसार-” जब मैंने गीता पढ़ी तब मैंने विचार किया कि कैसे ईश्वर ने ब्रह्मांड की रचना की है? तो मुझे बाकी सब कुछ व्यर्थ प्रतीत हुआ” इसके अतिरिक्त हेनरी डी थोरो के अनुसार-” हर सुबह में अपने हृदय और मस्तिष्क को श्रीमद भगवत गीता के उस अद्भुत और देवी दर्शन से स्नान कराता हूं जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और उसका साहित्य बहुत छोटा और तुच्छ जान पड़ता है।” इसके अतिरिक्त भी विश्व के कई विद्वानों ने भी श्रीमद भगवत गीता का अध्ययन किया है। श्रीमद भगवत गीता के प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक जहां से श्रीमद भगवत गीता की शुरुआत होती हैं स वह इस प्रकार है- धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:। मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ।।१।। यहां धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं की हे संजय धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मेरे पुत्रों और पांडवों के बीच युद्ध के क्या हाल समाचार हैं। इसके अतिरिक्त श्रीमद भगवत गीता में जीवन उपयोगी कई महत्वपूर्ण बातें लिखी गई है। जैसे कि दूसरे अध्याय के 63 वें श्लोक में क्रोध के संबंध में लिखा है- की जीव को क्रोध नहीं करना चाहिए क्रोध करने से सममोह सममोह से स्मृति भंस स्मृति भंस से बुद्धि का नाश बुद्धि के नाश से जीव स्वत: नष्ट हो जाता है । अतः इस पावन दिन व्यक्ति को चाहिए कि इस पावन धर्म ग्रंथ का मनन करना चाहिए जो जीवन में महत्वपूर्ण है। इस बार सन् 2021 में दिनाँक 14 दिसम्बर दिन मंगलवार को गीता जयंती मनाई जाएगी इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग एवं अमृत सिद्धि योग भी बन रहा है।
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।। महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन कुरुक्षेत्र में युद्ध करने से इंकार कर रहे थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने यह श्लोक कहा था। इसका अर्थ कुछ इस प्रकार से है। मैं अवतार लेता हूं मैं प्रकट होता हूं जब जब धर्म की हानि होती है तब तब मैं आता हूं। जब-जब अधर्म में बढ़ता है तब तब मैं साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूं। सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मैं आता हूं। दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं आता हूं। धर्म की स्थापना के लिए मैं आता हूं। और युग युग में जन्म लेता हूं। लेखक श्री पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल उत्तराखंड🙏

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