हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत महिलाओं के लिए रखता है विशेष महत्व

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वट सावित्री व्रत पर विशेष,,, वटस्य मूले शुद्धासने कृतनित्यक्रिया उपविश्य कलशं संस्थाप्य तत्र देवान सम्पूज्य,तत: पंच देवता: विष्णुंच सम्पूज्य कुशत्रयतिल जलान्यदाय, नमोअद्धय ज्येष्ठ मासे कृष्ण पक्षे अमावास्यां तिलक अमुक गोत्रो( अपने गोत्र का नाम) अमुक देवी ( अपना नाम) सौभाग्य प्राप्ति कामा ब्राह्मणा सह सावित्री पूजनं करिष्ये , संकल्प लेने के बाद सावित्री पूजन करें, किसी सुयोग्य ब्राह्मण द्वारा पूजा करवाये, इस बार यह व्रत 10 जून 2021 को है, वट सावित्री व्रत कथा,, पार्वती जी ने कहा हे देवताओं के देवता, जगत के पति शंकर भगवान! प्रभास क्षेत्र में स्थित ब्रह्मा जी की प्रिया जो सावित्री जी हैं, उनका चरित्र आप मुझसे कहिये, जिसमें व्रत का माहात्म्य हो और उनके संबंध का इतिहास हो, एवं जो स्त्रियों के पातिव्रत्य को देने वाला सौभाग्य दायक और महान उदय का करने वालाहो , तब शंकर भगवान ने कहा, हे पार्वती प्रभास क्षेत्र में स्थित सावित्री के असाधारण चरित्र को मैं तुमसे कहता हूँ, हे महेश्वरी सावित्री स्थल नामक स्थान में राजकन्या सावित्री ने जिस प्रकार से उत्तम वट सावित्री व्रत का पालन किया, मद्रास देश में एक धर्मात्मा सभी प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले राजधानी तथा राज्य में रहने वाली प्रजाओं का प्रिय अश्वपति नामक राजा था, जो क्षमा शील संतान रहित सत्य वादी और इन्द्रियों को वश में रखने वाला था, एक समय वह राजा प्रभास क्षेत्र की यात्रा के निमित्त वहाँ पर आया और विधिपूर्वक यात्रा करता हुआ सावित्री के स्थल पर पंहुचा, वहाँ पर उस राजाने अपनी रानी के साथ इस व्रत को किया, जो सावित्री व्रत से प्रसिद्ध सभी प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाला है, भूभुर्व: स्व: इस मंत्र की साक्षात मूर्ति बनकर स्थित श्री ब्रह्मा जी की प्रिया सावित्री देवी उस राजा पर प्रसन्न हुईं, कमण्डल को धारण करने वाली वह सावित्री देवी दर्शन देने के बाद पुनः अदृश्य हो गयी और बहुत दिनों के बाद उसी राजा के यहाँ देवी के समान रूप वाली कन्या के रूप में उत्पन्न हुई, सावित्री की प्रसन्नता से प्राप्त तथा सावित्री की पूजा करने के बाद हुई, अत: राजा ने ब्राह्मण की आज्ञा से कन्या का नाम सावित्री रखा, वह कन्या अत्यंत सुंदर थीऔर सुवर्ण की प्रतिमा के समान दिखाई पडती थी, लोग उसे देख कर यही समझते थे कि यह कोई देवकन्या है, वह सावित्री भृगु द्वारा कहे गये सावित्री व्रत को करने लगी व्रत के आरम्भ में सुंदर वर्ण वाली उसे उपवास करके शिर से स्नान की हुई सावित्री देवी की प्रतिमा के पास जाकर अग्नि में हवन करके ब्राह्मण से से स्वस्तिवाचन कराया और ब्राह्मण से अवशिष्ट पुष्पांजलि ग्रहण करके सखियों से घिरी हुई लक्ष्मी देवी के समान सुंदर रूप से सुशोभित हुई वरारोहा वह कन्या समीप में जाकर पिता के चरणों में प्रणाम कर प्रथम पुष्पांजलि को निवेदित कर हाथ जोड़कर राजा के पाश्र्व में स्थित हुई, युवा अवस्था को प्राप्त हुई देखकर राजा ने उसके विषय में मंत्री से सलाह की और राजकन्या से कहने लगा, हे पुत्री तुझे योग्य वर देने का समय आ गया है, मुझसे कोई तुझे मागने के लिए भी नहीं आता और मैं भी विचार करने पर तुम्हारे आत्मा के अनुरूप वर को नहीं पा रहा हूँ, अत: हे पुत्री देवताओं के निकट मैं जिस तरह निन्दनीय न होऊं वैसा तुम करो मैंने धर्म शास्त्रों में पढा और सुना भी है, कि यदि पिता के घर में रहती हुई विवाह के पहले ही जो कन्या रजोधर्म से युक्त हो जाती है, वहशूद्रा के समान समझी जाती है, तथा उसके पिता को ब्रह्म हत्या के समान पाप लगता है, इस लिए हे पुत्री में तुझे भेज रहा हूँ तुम स्वयं अपने योग्य वर ढूंढ लो, वृद्ध मंत्रियों के साथ शीघ्र जाओ और मेरी बात मानो, इसके बाद जैसा कहते हैं वैसे ही होगा, ऐसा कहकर सावित्री घर से निकल कर राजर्षि के रम्य तपोवन की ओर चल पडी, और वहाँ पंहुच के माननीय वृद्ध जनों को प्रणाम कर सभी तीर्थ आश्रम जाकर पुनः मंत्रियों के साथ सावित्री अपने घर आ गयी, वहाँ पिता के समक्ष देवर्षि नारद को बैठे देखा,आसन पर बैठे हुए नारद जी को प्रणाम कर मुस्कराती हुई जिस कार्य के लिए वन में गयी थी सारी कथा उनसे कहने लगी, सावित्री बोली हे देवर्षि नारद जी! शाल्व देश में धर्मात्मा द्धयुमत्सेन नाम से विख्यात एक क्षत्रिय राजा हैं, जो दैववश अन्धे है उस समय उनके छोटा सा बालक और उसकी माँ थी, ऐसे समय में अवसर पाकर उनका पूर्व वैरी रुकी नामक राजा ने उनसे राज पाट छीन लिया है,अतः वह आर्य द्युमत्सेन छोटे बच्चे के साथ लिए हुए अपनी स्त्री के साथ जंगल की ओर चल दिए, उनका वह पुत्र वन में ही बड़ा होकर धार्मिक सत्य बोलने वाला है, अतः अपने अनुरूप पति समझ कर मैंने उसे वरण कर लिया है, यह सुनकर नारद जी ने कहा कि हे राजन सावित्री ने यह बड़ा कष्ट प्रद कार्य कर डाला है, बाल बुद्धि होने से केवल गुणवान समझ कर सत्य वान को वरण कर लिया है, उसके पिता सत्य बोलते है, माँ सत्य बोलती है और वहभी सत्य बोलता है, इससे उसका नाम सत्य वान रखा है, उसको घोड़े प्रिय है, और वह मिट्टी के घोड़े बनाया करता है, इस लिए उसे चित्राश्व भी कहते हैं, सत्य वान दान और गुण में रन्तिदेव के शिष्यो के समान है, ब्राह्मण की रक्षा करने वाला है, किन्तु उसमें केवल एक यही दोष है, कि सत्य वान आजसे ठीक एक वर्ष बाद देह त्याग कर देगा, इस प्रकार नारद जी की बात सुनकर सावित्री ने कहा राजा लोग किसी से एक बार कोई बात कहते हैं, ब्रह्म वेताल एक ही बार कहते हैं, एक ही बार कन्या दी जाती है, अतः दीर्घायु हो अथवा अल्पायु वर को एक ही बार वरण कर लिया अब दूसरे वर को वरण नहीं करुंगी, नारद ने कहा हे राजन यदि आप को इष्ट हो तो सावित्री का कन्या दान शीघ्र कर डालिए, ऐसा कहकर नारद जी आकाश मार्ग से स्वर्ग लोक को चले गये, उसके बाद राजा ने सावित्री का विवाह संबंधित कार्य सम्पन्न किया और सावित्री सत्य वान को पाकर प्रसंन्न हुई, पुनः शिव जी पार्वती जी से कहते हैं, हे पार्वती इस प्रकार उस आश्रम में उस समय हुये सावित्री और सत्य वान के कुछ समय व्यतीत हुये, उस समय केवल एक भार्या सावित्री ही ऐसी थीं कि जिसके चित्त में रात दिन जो नारद जी की कही हुई बात थी, उसके बाद बहुत दिनों बाद वह समय आ गया था कि जिसमें सत्य वान को मरना था, सायंकाल में आज से चौथे दिन मेरे पति को मरना चाहिए यह सोचकर तीन रात्रि तक निराहार व्रत रख कर रात दिन आश्रम में स्थिररुप से रहने लगी , इसके बाद तीन रात्रि बीत जाने के बाद प्रातः काल स्नान कर देवताओं का तर्पण करने के बाद सावित्री ने सास श्वसुर का पद वन्दन किया इसके बाद जब कुल्हाड़ी लेकर सत्य वान जंगल कीओर चला तब जाते हुए अपने पति के साथ सावित्री भी चली, वन में पंहुच कर सत्य वान जल्दी से फल पुष्प और कुशातथा लडकीयों इक्ट्ठा कर ले जाने योग्य भार बनाने लगा, काटते काटते उसके सिर में पीड़ा होने लगी, वह कार्य छोड़ कर वृक्ष की शाखा का सहारा ले कर सावित्री से कहने लगा हे सुन्दरी सिर की वेदना मुझे दुख दे रही है, अतः मैं तुम्हारे गोद में क्षण भर सोना चाहता हूं, सावित्री ने दुखी हो कर कहा हे महा बाहो आप विश्राम करें पीछे हम श्रम दूर करने वाले आश्रम को चलेंगे, जैसे ही पृथ्वी पर बैठी हुई सावित्री ने सिर को गोद में रखा वैसे ही उसने कृष्ण मिश्रित पिंगल वर्ण वाले किरीट धारी पीत वस्त्र पहने हुए साक्षात सूर्य के समान पुरुष को देखा उसे देख कर सावित्री प्रणाम कर मधुर वचनों में कहने लगी आप देवताओं और दैत्य में कौन है, जो मुझे धर्म च्युत करने के लिए आये है, मुझे अपने धर्म से च्युत करने के लिए कोई समर्थ नहीं है, क्योंकि हे पुरुष श्रेष्ठ मुझे धधकते आग की लपटों के समान ही समझये , यमराज ने कहा कि मैं सब प्राणियों के लिए भयंकर और कर्मानुसार उनका उचित दण्ड देने वाला यम हूँ, सो हे पति व्रता सावित्री समीप में पडे तुम्हारे इस पति की आयु समाप्त हो गयी है, इसे यमदूत पकड़ कर नहीं ले जा सकंगे इसलिए मैं स्वयं आया हूँ, ऐसा कहकर फांसको लिए हुए यमराज ने सत्य वान के शरीर से अंगुष्ठ मात्र शरीर वाले पुरुष को निकाल दिया, इसके बाद पितृगण से सेवित यमपुरी के मार्ग कीओर चला तो सावित्री भी उसके पीछे चली यमराज ने पति व्रता होने के नाते चलने में थकती हुई उससे कहा हे सावित्री एक मुहूर्त हुआ तुम यहाँ तक मेरे साथ आगयी अब लौट जाओ, हे विशाल नेत्रों वाली कोई भी जीव बिना आयु समाप्त हुये इस यमपुरी के मार्ग पर नहीं आ सकता, सावित्री ने कहा कि आपके जैसे विशिष्ट पुरुष के साथ पति का अनुगमन करती हुई मुझे कभी भी ग्लानि नहीं है, स्त्री की गति उसका पति वर्णाश्रम की गति वेद और शिष्यो की गति गुरु है, इस पृथ्वी तल में सब प्राणियों के स्थान है, किन्तु स्त्री यो के लिए तो एक मात्र पति को छोड़कर दूसरा कोई स्थान नहीं है, इस प्रकार से धर्म और अर्थ से भरे हुए सुंदर मधुर वाक्यों से यमराज ने प्रसंन्न होकर सावित्री से यहबात कही, हे भामिनी मैं तुमसे प्रसंन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, तुम मुझसे वर मागो,सावित्री ने भी विनय से सिर झुका कर अपने लिए राज्य पाने का वर मांगा और अपने महात्मा श्वसुर के लिए देखने की शक्ति पाने के साथ पुनः राज्य पाने एवं अपने पिता के लिए सौ पुत्र और अपने लिए भी सौ पुत्र की प्राप्ति के लिए वर मांगा, इस प्रकार वर मांगने पर यमराज ने भी उसे अभीष्ट वर प्रदान कर वापस किया, उसके बाद सावित्री पति का जीवन दान प्राप्तकर प्रसंन्न होती हुई अपने पति के साथ शान्ति के साथ आश्रम कीओर चली जाती है, इसी सावित्री ने ज्येष्ठ की पूर्णिमा के दिन इस सावित्री व्रत को किया था, जिसके प्रभाव से श्वसुर को नेत्र की प्राप्ति हुई, उसके बाद उन्हें निष्कंटक अपने देश तथा राज्य की प्राप्ति हुई, और सावित्री के पिता को सौ पुत्र तथा सावित्री कोभी सौ पुत्र प्राप्ति हुई, इस प्रकार सावित्री व्रत के संपूर्ण माहात्म्य को मैंने तुमसे कह दिया, पार्वती जी ने कहा कि हे देव सावित्री के द्वारा किया हुआ वह महान व्रत किस प्रकार का है, और जेष्ठ मास में उसका विधान कैसे किया जाता है, हे विभो उस व्रत के देवता कौन है, कौन कौन मंत्र है, क्या फल हैं, सो हे महेश इस सनातन धर्म को विस्तार पूर्वक मुझसे कहें, शिव जी ने कहा कि हे देवदेवेशि सावित्री व्रत को आदर पूर्वक सुनो, हे महेश्वरी उस सावित्री ने जिस तरह इस व्रत को किया उसे मैं कह रहा हूँ, ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी के दिन प्रातः दन्त धावन कर चुकने के बाद तीन रात्रि तक उपवास करने का नियम करें, यदि उपवास करने में असमर्थ है तो त्रयोदशी की रात्रि उपवास कर चतुर्दशी के दिन बिना मांगे प्राप्त हुये अन्न को ग्रहण करें, तथा पूर्णिमा के दिन उपवास करें, हे महेश्वरी प्रति दिन तालाब नदी या कूप में स्नान करने से सर्व स्नान का फल प्राप्त करें, हे यशस्विनीं विशेष पूर्णिमा में सरसों और मृत्तिका मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए, 64 रुपए अटने लायक पात्र में बालू भर कर या तिल आदि भरे, फिर दो वस्त्र के टुकड़ों से वेष्टित बांस की डलिया में सब अवयवों से सुशोभित सुवर्ण या मिट्टी या काष्ठ की बनी हुई सावित्री की प्रतिमा को रख कर उसमें सावित्री के लिए दो रक्त वस्त्र देवैं और ब्रह्मा की प्रतिमा के लिए श्वेत वस्त्र दे, इस प्रकार से ब्रह्मा के साथ सावित्री का यथा शक्ति गन्ध पुष्प धूप दीप नैवेद्य से पूजा करें, पूर्ण तैयार हुई तोरयी नारियल खजूर अनार जामुन नींबू नारंगी अखरोट कटहल जीरा कालीमिर्च आदि को बांस की बनी हुई डलिया में रखकर रेशमी वस्त्र से वेष्टित कर कुमकुम के रंग से रंग दें, इस प्रकार से ब्रह्मा जी की प्रिया सावित्री की स्थापना होती है, ब्रह्मा के साथ उस सावित्री का मंत्र के साथ पूजा करें, जिसके पूर्व में ऊंचाई यह वर्ण है ऐसी वीणा और पुस्तक धारण करने वाली वेदों की जननी हे देवी तुम्हें नमस्कार है, मुझे विधवा न होने का वरदान दो, इस प्रकार से विधिवत पूजा करके वहाँ पर रात्रि जागरण की विधि कराये, गाने बजाने के साथ नर नारी वृन्द मिल कर नृत्य शास्त्र में विशारद के साथ नाचें हंसी खुशी के साथ रात्रि व्यतीत करें, और सावित्री की कथा अच्छे ब्राह्मण द्वारा गीत भाव तथा रस के साथ प्रभात होने तक कहलावे , इस प्रकार से सावित्री का ब्रह्मा जी के साथ विवाह कर सात द्विज दम्पति को श्वेत वस्त्र पहना कर सभी सामग्रियों से युक्त गृह दान देना चाहिए, और वेद के ज्ञाता ब्राह्मण को प्रतिमा दे, इसके बाद सावित्री कल्प जानने वाले सावित्री कथा वाचक ब्राह्मण को इस प्रकार विधि पूर्वक सावित्री प्रतिमा दान दे, लेखक पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल

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