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बहुत महत्वपूर्ण है अजा एकादशी व्रत,,,,,,,,, भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी अथवा जया एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस बार सन 2021 में यह व्रत शुक्रवार दिनांक 3 सितंबर 2021 को मनाया जाएगा। एकादशी तिथि प्रारंभ गुरुवार दिनांक 2 सितंबर प्रातः 6:21 से तथा एकादशी तिथि समाप्त होगी दिनांक 3 सितंबर प्रातः और एकादशी व्रत का पारण होगा दिनांक 4 सितंबर शनिवार प्रातः 5:30 से प्रातः 8:23 तक। वर्ष में कुल 24 एकादशी होती हैं। और अगर किसी वर्ष से अधिक मास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार अन्य एकादशी व्रतों की तरह भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को यह कथा सुनाई। एक बार अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से कहा हे पुंडरीकाक्ष ! मैंने सावन शुक्ल एकादशी अर्थात पुत्रदा एकादशी का सविस्तार वर्णन सुना। अब आप कृपा करके मुझे भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में भी बतलाइए। इस एकादशी को क्या कहते हैं? और इसका क्या विधान है? इसका व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है? अर्जुन की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण बोले हे कुंती पुत्र! भादो मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहते हैं। इसका व्रत करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस लोक और परलोक में सहायता करने वाली इस एकादशी व्रत के समान और कोई व्रत नहीं है। अब ध्यान पूर्वक इस एकादशी का महात्म्य श्रवण करो। पौराणिक समय में भगवान श्री राम के वंश में अयोध्या नगरी में एक चक्रवर्ती राजा हरिश्चंद्र नाम के राजा हुए। राजा अपनी सत्य निष्ठा और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध थे। एक बार देवताओं ने इनकी परीक्षा लेने की योजना बनाई। राजा ने सपने में देखा कि ऋषि विश्वामित्र को उन्होंने अपना राजपाट दान कर दिया है। सुबह विश्वामित्र वास्तव में उनके द्वार पर आकर कहने लगे तुमने स्वप्न में मुझे अपना राज्य दान कर दिया। राजा ने कनिष्ठ व्रत का पालन करते हुए संपूर्ण राज्य विश्वामित्र को दे दिया। दान के लिए दक्षिणा चुकाने हेतु राजा हरिश्चंद्र को पूर्व जन्म के कर्म फल के कारण पत्नी बेटा एवं खुद को बेचना पड़ा। हरीश चंद्र को एक डोम ने खरीद लिया जो श्मशान भूमि में लोगों के दाह संस्कार का काम करवाता था। स्वयं वह एक चांडाल का दास बन गया। उसने उस चांडाल के यहां कफन लेने का काम किया। किंतु उसने इस आपत्ति के काम में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। जब इसी प्रकार उसे कई वर्ष बीत गए तो उसे अपने इस नीच कर्म पर बड़ा दुख हुआ और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगा। वह सदैव इसी चिंता में रहने लगा कि मैं क्या करूं? किस प्रकार इस नीच कर्म से मुक्ति पाओ? एक बार की बात है वह इसी चिंता में बैठा था कि गौतम ऋषि उनके पास पहुंचे। हरीश चंद्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुख भरी कथा सुनाने लगे। राजा हरिश्चंद्र की दुख भरी कहानी सुनकर महर्षि गौतम भी अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने राजा से कहा हे राजन भादो मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा है तुम उस एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो तथा रात्रि को जागरण करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे। महर्षि गौतम इतना कहकर आलोक हो गए। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी आने पर राजा हरिश्चंद्र ने महर्षि के कहे अनुसार विधिपूर्वक उपवास तथा रात्रि जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी पाप नष्ट हो गए। उस समय स्वर्ग में नगाड़े बजने लगे तथा पुष्पों की वर्षा होने लगी। उन्होंने अपने सामने ब्रह्मा विष्णु महेश तथा देवराज इंद्र आदि देवताओं को खड़ा पाया। उन्होंने अपने मृतक पुत्र को जीवित तथा अपनी पत्नी को राजस्व वस्त्र तथा आभूषण ओं से परिपूर्ण देखा। व्रत के प्रभाव से राजा हरिश्चंद्र को पुनः अपने राज्य की प्राप्ति हुई। वास्तव में एक ऋषि ने राजा की परीक्षा लेने के लिए यह सब कौतुक किया था। परंतु अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ऋषि द्वारा रची गई सारी माया समाप्त हो गई। और अंत समय में राजा हरिश्चंद्र अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक को गया। हे राजन यह सब अजा एकादशी के व्रत का प्रभाव था। जो मनुष्य इस उपवास को विधिपूर्वक करते हैं तथा रात्रि जागरण करते हैं उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वे स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। इस एकादशी व्रत की कथा के श्रवण मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ के फल की प्राप्ति हो जाती है। लेखक पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल,

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