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तुलसीदास जयंती पर विशेष।,,,,,,,,,,,,,, गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म संवत् 1554 को सावन शुक्ल पक्ष की सप्तमी को हुआ था। इस बार सन् 2021 में हमारा राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस एवं तुलसीदास जयंती संयोग से 1 दिन मनाई जाएगी। ज्योतिष तिथि गणना के अनुसार ऐसा शुभ संयोग बहुत वर्षों बाद आता है। इससे पूर्व सन 1983 में ऐसा संयोग था। जब भारतीय स्वतंत्रता दिवस के दिन सावन शुक्ला सप्तमी थी। अब इसके बाद सन 2059 के स्वतंत्रता दिवस को श्रावण शुक्ला सप्तमी होगी। तुलसीदास जी के मतानुसार इंसान का जैसा संग होगा उसका आचरण एवं व्यवहार भी ऐसा ही होगा। सत्संग के प्रभाव से तो कौवा भी कोयल बन जाता है। यदि आप विद्वान जनों के संगत में रहेंगे तो आप अवश्य ज्ञान अर्जित कर लेंगे। इससे भी महत्वपूर्ण बात हमें तुलसीदास जी के जीवन से संबंधित बात ज्ञात होती है की भारतीय नारी की सीख जो इंसान को क्या से क्या बना देती है। जिस देवी स्वरूप नारी के मात्र 1 वाक्य ने तुलसीदास जी को ज्ञान का एक भंडार दे दिया। एक बार किसी कार्य वश उनकी पत्नी मायके गई हुई थी। तुलसीदास जी का पत्नी से अत्यधिक प्रेम था। मात्र कुछ दिन की अनुपस्थिति में ही उन्हें पत्नी की बहुत याद सताने लगी वह खुद पत्नी के मायके पहुंचे। तुलसीदास जी की पत्नी ने मात्र उनसे यह कहा की। अस्थि चर्म मय देह यह। ता सौं ऐसी प्रीति । नेकू जो होती राम से तो काहे भव भीत।। अर्थात मेरे इस हाड मांस के शरीर के प्रति जितनी तुम्हारी आसक्ति है उसकी आधी भी अगर प्रभु राम से होती तो तुम्हारा जीवन संवर गया होता। पाठक को एवं भक्तों इसीलिए तो कहते हैं कि पुरुष की कामयाबी के पीछे नारी का हाथ होता है। सिर्फ यही नहीं महर्षि कालिदास जी का उदाहरण भी ले लीजिए जो एक निपट अज्ञानी जिन्हें इतना भी ज्ञान नहीं था कि पेड़ की जिस शाखा में बैठे हैं उसी को काट रहे हैं। और बाद में विधोतमा जैसी विद्वान नारी के संपर्क में रहकर अभिज्ञान शाकुंतलम् कुमारसंभव जैसे न जाने कितने ही ग्रंथ लिख डाले। पाठकों को एक और महत्वपूर्ण बात बताना चाहूंगा की तुलसीदास जी का एक कथन है कि सत्संग संतो का संग किए बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता। और सत्संग तभी प्राप्त होता है जब ईश्वर की कृपा होती है। मात्र साधन से कुछ हाथ नहीं आएगा। साधन तो मात्र फूल के समान है। संसार रूपी पेड़ में यदि फल है तो वह सत्संग है अन्य सभी साधन फूल की तरह निरर्थक है। कल से ही उदर पूर्ति होती है नकी फूल से। पाठकों से मेरा विनम्र निवेदन है की उक्त वाक्यों पर गहराई से मनन करें सिर्फ मन ही नहीं अपितु उन्हें अपने जीवन में उतारना महत्वपूर्ण है। हम प्रतिदिन भगवान का स्मरण करते हैं स्मरण का अर्थ है याद करना सिर्फ याद करने से कुछ नहीं होता याद शब्द को उल्टा करके देखें दया शब्द बनता है दया शब्द सबसे महत्वपूर्ण है प्रत्येक जीव पर दया कीजिए। तुलसीदास जी ने कहा है। दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान। तुलसी दयाना छोड़िए जब लग घट में प्राण।। तुलसीदास जी कहते हैं की धर्म का मूल भाव ही दया है इसलिए मनुष्य को दया त्यागने नहीं चाहिए। इसके अलावा जो लोग हमेशा दूसरों को कठोर या मन दुखाने वाली बातें करते हैं। कभी प्रेम से बात नहीं करते उनके लिए भी तुलसीदास जी ने यह शिक्षाप्रद बात कही है। तुलसी मीठे वचन ते सुख उपजत चहुं ओर। वशीकरण एक मंत्र है परी हरु वचन कठोर।। अर्थात तुलसीदास जी कहते हैं की मीठे वचन सब और सुख फैलाते हैं। मीठे बोल किसी को भी वश में करने का मंत्र है। इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोड़कर मीठा बोलने का प्रयास करें। धन्यवाद। पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल

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