खास खबर- 1930 के दशक में कौन सा आधुनिक शैम्पू आया था अस्तित्व में

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आधुनिक शैम्पू 1930 के दशक में अस्तित्व में आया था।
डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय देहरादूनए उत्तराखंड
बाजार में नहाने का बिना साबुन वाला आधुनिक शैम्पू 1930 के दशक में अस्तित्व में आया। हिमालय की तलहटी में सदियों से भीमल की पतली टहनियों की छाल गजब का शैंपू थी। नहानेए कपड़े धोने के लिए इसी का इस्तेमाल होता रहा। इसमें साबुन के उच्च अणुभार वाले कार्बनिक वसीय अम्लों के सोडियम या पोटैशियम लवण नहीं होते। इसका चिप.चिपा पदार्थ पानी में घुलकर झाग पैदा करता है और गंदगी को घोल लेता है। यह कार्बोलिक समान औषधीय पदार्थ बालों या कपड़ों से झाग के साथ मैल की छोटी.छोटी गुलिकाएं बना देता है। इस प्रक्रिया में कणों के बीच पृष्ठ तनाव बेहद कम हो जाता है। हाथों से हल्का मलने पर मैल की ये गुलिकाएं वस्त्र से अलग हो जाती हैं और पानी में घुल जाती हैं। इस हल्के तैलीय पदार्थ का इमलशन मैल के कणों को दुबारा शरीर या वस्त्र पर नहीं जमने देता है। इससे शरीर की त्वचा भी नरम बनी रहती है।इसका पौधा खुद ही उगता है। यदि एक स्थान से उठा कर दूसरे स्थान पर ले गए तो पौधा जान दे बैठता है और सूख जाता है। इसको अपने मृत शरीर से छेड़छाड़ भी कतई पसंद नहीं। पेड़ सूखते ही इसकी लकड़ी बेहद कमजोर हो जाती है। इसका इमारतों में कोई उपयोग नहीं हो सकता। चूल्हे पर जलाना भी संभव नहीं। आग पकड़ते ही यह तीखी दुर्गंध पैदा करता है। लिहाजा पौधा सूखते ही गिर पड़ता है और मिट्टी में अपनी गति को प्राप्त होता है।प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधनों का समुचित उपयोग न होने के कारण उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र आज भी औद्योगिक रूप से पिछड़े हुए हैं। कहा जाये तो एक शताब्दी पहले का समाज अधिक स्वावलम्बी था। तब संसाधनों के बेहतर उपयोग एवं नवीन खोजों के लिये चिंतन भी समाज में कई स्तरों पर होता रहता था। ऐसा ही उदाहरण स्वर्गीय अमर सिंह रावत जी की अनूठी कोशिशों का है। उन्होंने एक अन्वेषक एवं उद्यमी के रूप में कई योजनायें तैयार कींए जो अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण सफल नहीं हो सकीं। उनके द्वारा सन् 1940 में लिखी गई पुस्तक ष्पर्वतीय प्रदेशों में औद्योगिक क्रांतिष् में उनके अनुभवों का विस्तृत वर्णन है।अमर सिंह रावत का जन्म 13 जनवरी 1892 को पौड़ी गढ़वाल में असवालस्यूं पट्टी के सीरों ग्राम में हुआ था। उन्होंने कडारपाणीए नैथाना तथा काँसखेत विद्यालयों से प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण की। मिडिल में फेल होने के बाद स्कूली शिक्षा से उनका नाता टूट गया। परंतु व्यवहार से सीखने का सिलसिला जीवनपर्यन्त चलता रहा। उनके जीवन का अधिकांश हिस्सा यायावरी में गुजरा। जीविकोपार्जन की गाड़ी उन्होंने ष्सर्वे ऑफ इंडियाष् देहरादून में क्लर्की से प्रारम्भ की। उसके बाद रुड़की में टेलरिंग का काम सीखा और कुछ महीनों बाद दर्जी की खुद की दुकान चलाने लगे। फिर नाहन ;हिमाचल प्रदेशद्ध जाकर अध्यापकी शुरू कर दी। वहाँ मन नहीं लगा तो दुगड्डा ;कोटद्वारद्ध के समीप के विद्यालय में अध्यापक हो गये। मन वहाँ पर भी नहीं टिका तो सीधे लाहौर पहुँच गयेए जहाँ आर्य समाज के प्रभाव में आ कर छोटे.मोटे रोजगार के साथ धर्मग्रंथों का अध्ययन करने लगे। फिर गढ़वाल वापस आकर आर्य समाज के प्रचारक बनकर गाँव.गाँव घूमने लग गये। इस बीच डीण्एण्वीण् स्कूल दुगड्डा में प्रबंधक का कार्य भी किया। संयोग से उस समय टिहरी गढ़वाल की रियासत में भूमि बंदोबस्त अधिकारी के महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत जोध सिंह नेगी से उनका सम्पर्क हुआ और उन्हें भूमि बंदोबस्त विभाग में नौकरी मिल गई। कुछ ही समय बाद जोध सिंह नेगी ने जब अपने पद से त्यागपत्र दिया तो अमर सिंह रावत भी नौकरी छोड़ कर उन्हीं के साथ पौड़ी आ गये। बाद में जोध सिंह रावत ने गढ़वाल क्षत्रिय समिति के तहत ष्क्षत्रिय वीरष् समाचार पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया। अमर सिंह इन सब कार्यों में उनके प्रमुख सहायक के रूप में कार्य करने लगे। कुछ समय बाद पुनः मन बदला तो अमर सिंह कराची जा कर गढ़वाली समाज के मध्य आर्य समाज के प्रचारक बन गये। इस बीच क्वेटा ;बलूचिस्तानद्ध में भी कुछ समय के लिये उनका प्रवास रहा। उम्र का एक लम्बा समय यायावरी में गुजारने के बाद सन् 1926 में वे वापस अपने पैतृक गाँव सीरों आ गये।सीरों आकर रावत ने स्थानीय लोगोंए विशेषकर महिलाओं की दिनचर्या संबंधी कष्टों को कम करने तथा युवाओं को स्वरोजगार की ओर प्रेरित करने सोचना शुरू किया। इसके लिये उन्होंने सर्वप्रथम अपने घर को ष्स्वावलम्बी शिक्षा सदनष् नाम दिया। स्थानीय जीवन में विदेशी उत्पादों के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से उन्होंने उस समय देश में प्रचलित ष्स्वदेशी में ही स्वराज्य हैष् के नारे को बुलंद किया। स्थानीय वनस्पतिए कृषिए वनए खनिज एवं जल सम्पदा के बारे में व्यावहारिक लोकज्ञानए प्रचलित तकनीकी तथा उपलब्ध साहित्य का गहन अध्ययन कर उन्हें लिपिबद्ध किया। तत्पश्चात् इन संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिये नवीन एवं सरल तकनीकी इजाद की। उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यस्था में सुधार के दृष्टिगत स्थानीय परिवेश तथा संसाधनों के अनुकूल कई उत्पादों का निर्माण एवं विकास किया। इसमें सूत कातने के चर्खेए अनाज पीसने एवं कूटने की चक्कीए पवन चक्कीए वार्निशए साबुनए सूती तथा ऊनी कपड़ाए प्राकृतिक रंगए कागजए इत्रए सीमेंट आदि प्रमुख हैं। सन् 1927 से 1940 तक 13 वर्षों के उनके अथक प्रयासों से गढ़वाल के बाहर देश.प्रदेश के महत्वपूर्ण व्यक्तियों के बीच भी उनकी चर्चा होने लगी थी।अमर सिंह रावत के आविष्कारों के पीछे यह विचार प्रमुख था कि दैनिक कार्यों में सुधार ला कर समयए धन एवं श्रम की बचत की जा सकती है। इसी क्रम में अनाज कूटने के कार्य को ज्यादा सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से उन्होंने दो तरफ अनाज कूटने वाली गंजेली बनाईए जो एक पाँव से दबाने पर ही बारी.बारी से दोनों ओर की ओखली में रखे अनाज को कूटती थी। यह गंजेली महिलाओं में काफी लोकप्रिय हुई। इसके बाद उन्होंने अनाज पीसने के लिये सुविधाजनक तीन चक्कियाँ बनाई। इनके नाम क्रमशः अमर चक्कीए जगमोहन चक्की तथा हवाई चक्की रखा। उन्होंने अपने गाँव की धार पर तेज हवा से चलने वाली हवाई चक्की का सफल प्रयोग किया। अनाज पीसने के लिये इसका लाभ भी ग्रामीणों ने कई वर्षों तक लिया।अमर सिंह रावत के आविष्कारों में प्रमुख भीमलए भांगए कंडालीए सेमलए खुगशए मालू तथा चीड़ की पत्तियों से विविध किस्म का ऊनी तागा तथा कपड़ा तैयार करके उसे व्यावसायिक स्वरूप देने की कोशिश रहा। चीड़ के पिरूल से ऊन निर्माण में उन्होंने पूर्ण सफलता प्राप्त की। चीड़ की पत्तियों से बने ऊन से उन्होंने कई तरह की बास्कट बनायीए जिसे वे स्वयं भी पहनते थे। चीड़ के पिरूल से बने कपड़े को स्वयं सिलकर बनाई एक जैकेट को उन्होंने पंडित नेहरू को भेंटस्वरूप दिया था। इस जैकेट को उन्होंने ष्जवाहर जैकेटष् नाम दिया। विविध वनस्पतियों से बने ऊनी एवं सूती कपड़ों को देख कर सन् 1940 में नैनीताल में आयोजित एक प्रदर्शनी में बम्बई के प्रसिद्ध उद्योगपति सर चीनू भाई माधोलाल बैरोनेट बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने इस पूरी कार्ययोजना एवं फार्मूले को एक लाख रुपये में खरीदने का प्रस्ताव अमर सिंह रावत जी के सम्मुख रखा। बैरोनेट इसका कारखाना बम्बई में स्थापित करना चाहते थेए मगर अमर सिंह जी इस बात पर अडिग रहे कि यह कार्य गढ़वाल में ही हो ताकि यहाँ के लोगों को इसका सीधा फायदा मिल सके। अतः बात बन न सकी। रावत जी ने अपने सीमित संसाधनों से गढ़वाल में ही इस योजना को संचालित करने का बीड़ा उठाया। उस समय के जिला प्रशासन की मदद से भांगए कंडालीए चीड़ए भीमल आदि के रेशों एवं पत्तियों से कपड़ा बनाने की कार्ययोजना तैयार की। पौड़ी गढ़वाल के कण्डारस्यूँ पट्टी के चैलूसैंण स्थान पर इस कार्य को करने की आम सहमति बनी। तत्कालीन जिला प्रशासन ने इस कार्य के लिये तब आठ हजार रुपये अनुदान के रूप में स्वीकृत किये थे। समय की विडम्बना रही कि उन्हीं दिनों अमर सिंह जी का स्वास्थ्य बिगड़ गया। कुछ महीनों बीमार रहने के बाद 30 जुलाय 1942 को सतपुली के निकट बांधाट अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गयी। उनका सपना पूरा न हो सका। उनकी मृत्यु के बाद भक्तदर्शन जी ने अमर सिंह रावत के कार्यों को व्यवहार में लाने के लिये कई प्रयास किये। गढ़वाल से प्रथम लोकसभा सदस्य बनने पर भक्तदर्शन जी ने सन् 1952 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने अमर सिंह जी की चीड़ के पिरूल से ऊन बनाने की कार्ययोजना प्रस्तुत की। नेहरूजी ने अपनी सकारात्मक टिप्पणी के साथ इस योजना को परीक्षण के लिये अधिकारियों एवं विशेषज्ञों के पास भेजा। परीक्षण के उस जंजाल में फँसी यह योजना फिर अंत तक फँसी ही रही। लम्बे समय तक इस योजना को अमल में लाने के लिये उच्च स्तर पर पत्राचार होता रहा। बाद में उसका त्रासदीपूर्ण अंत हो गया। ऊन एवं कपड़ा निर्माण के अतिरिक्त अमर सिंह रावत ने सुरई के पौंधे से वार्निश तथा विभिन्न झाड़ियों से प्राकृतिक रंगों को तैयार किया। खुशबूदार पौधों से इत्र तथा साबुन भी बनाया। विविध वनस्पतियों के पल्प से कागज का भी उन्होंने निर्माण किया। मुलायम पत्थरों की चट्टान एवं खदान से सीमेंट बनाने में वे सफल रहे। उसी सीमेंट से उन्होंने अपने घर एवं गाँव के छज्जों का निर्माण किया। अमर सिंह रावत ने सूत कातने के चरखे में सुधारात्मक उपाय किये। उनके बनाये सूत कातने के चर्खे तक खूब लोकप्रिय हुए।अमर सिंह ने वर्ष 1927 से 1940 तक कई नवीन प्रयोग करके अनेक व्यावसायिक उत्पाद निर्मित किये। समय.समय पर इन उत्पादों को विभिन्न प्रदर्शनियों में भी उन्होंने प्रदर्शित किया। उन्होंने लखनऊए कानपुरए नैनीतालए बागेश्वरए अल्मोड़ाए पौड़ीए कोटद्वार तथा कर्णप्रयाग की प्रदशर्नियों में भाग लिया। उनके गाँव का घरए घर कम वर्कशॉप या प्रयोगशाला अधिक था। यह विडम्बना ही है कि उनके आविष्कारों को यथोचित सहयोग न मिलने के कारण वे अपने कार्य को विस्तार नहीं दे पायेए यद्यपि उसके लिये उन्होंने अपनी पैतृक सम्पत्ति एवं जमा पूँजी को तक स्वाहा कर डाला। अपनी व्यथा को व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा है कि ष्ष्मैं जिन अवसरों को ढूँढ रहा थाए वे भगवान ने मुझे प्रदान किये। परंतु मैं कैसे उनका उपयोग करूँए यह समस्या मेरे सामने हैं। मेरे द्वारा की गई खोजों को व्यावहारिक रूप देने के लिये मेरे पास यथोचित साधन नहीं हैं। अब तक इस पागलपन में मैं अपनी सम्पूर्ण आर्थिक शक्ति को खत्म कर चुका हूँ। होतीण् आज भी सीरों गाँव में उनके घर के आंगन में रावत जी का स्वम का बनाया सीमेंट उनके यहाँ तक कि स्त्री.बच्चों के लिये भी कुछ नहीं रखा। अब केवल मेरा अपना शरीर ही बाकी है।ष्ष्जुझारू उद्यमी अमर सिंह उन महानुभावों में हैं जिन्हें जमाना समझ नहीं पाया। आज से 80 वर्ष पूर्व के इस जिज्ञासु व्यक्ति की खोजी प्रवृत्ति को बल मिलता तो औद्योगिक पिछड़ेपन की पहचान से हम कब के मुक्त हो गये होते। नये राज्य में अमर सिंह के अमर प्रयासों की गहन पड़ताल हम सबको नई एवं सही दिशा की ओर गतिशील करने में जरूर मददगार साबित होगी।यदि उनकी खोजी योग्यता को मदद मिल जाती तो और ही बात अदभुत प्रयासों की याद दिलाता हैण् अमर सिंह रावत जी ने अपनी खोजों को व्यवहारिक रूप देने के साथ उन्हें लिपिबद्ध भी कियाण् विभिन्न उत्पादों के निर्माण की तकनीकी एवं फार्मूलों को उल्लेखित करते हुए सन् 1940 में ष्पर्वतीय प्रदेशों में औद्योगिक क्रान्तिष् पुस्तक तैयार कीण् पर जीते जी उसे प्रकाशित नहीं कर पायेण् मानव बस्ती उजड़ते ही भीमल का पेड़ खत्म हो जाता है। आबादी की रक्षा के लिए बसासत के आसपास उगने वाले और भी बहुत सारी वनस्पतियां हैं। इनका जीवन से गहरा नाता है। हिमालय तभी बचेगा जब हिमालय में निवास करने वाले मानव समेत सभी जीव सुरक्षित रहेंगे।जो काम राज्य सरकार आज करने को कह रही है अमर सिंह रावत उसे नब्बे साल पहले कर चुके थेण्
उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर चुके हैं वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

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