आधे-अधूरे तथ्यों, भ्रामक डिजिटल सामग्री एवं सोशल मीडिया ट्रायल से आहत कुमाऊँ विश्वविद्यालय का शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी एवं छात्र समुदाय
कुमाऊँ विश्वविद्यालय के डी.एस.बी. परिसर, नैनीताल, जे.सी. बोस परिसर, भीमताल तथा प्रशासनिक भवन से जुड़े शिक्षकों, कर्मचारियों, शोधार्थियों एवं छात्र-छात्राओं की एक आपात संयुक्त बैठक में विगत दिनों एक यू-ट्यूब चैनल एवं उससे संबद्ध फेसबुक पेज के माध्यम से कुमाऊँ विश्वविद्यालय, उसके अधिकारियों तथा विशेष रूप से कुलपति प्रो. दीवान सिंह रावत को लेकर प्रसारित की जा रही सामग्री पर गहरी चिंता, पीड़ा और कड़ी आपत्ति व्यक्त की गई।
बैठक में उपस्थित सदस्यों ने कहा कि विश्वविद्यालय किसी भी विद्यार्थी की शिकायत को गंभीरता से लेता है और प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी बात रखने तथा न्याय प्राप्त करने का पूरा अधिकार है। किंतु किसी शिकायत अथवा प्रशासनिक प्रकरण के आधे-अधूरे तथ्यों, चयनित दस्तावेजों, एकपक्षीय कथनों तथा अपुष्ट आरोपों को लगातार सनसनीखेज वीडियो एवं सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से प्रस्तुत करना और उसके आधार पर किसी व्यक्ति अथवा पूरे संस्थान की सार्वजनिक छवि को प्रभावित करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
शिक्षकों, कर्मचारियों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भावुक स्वर में कहा कि सोशल मीडिया पर चल रही इस प्रकार की एकतरफा प्रस्तुति से पूरा विश्वविद्यालय समुदाय आहत है। विश्वविद्यालय केवल एक भवन या प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि हजारों विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों, शोधार्थियों, पूर्व छात्रों और समाज की वर्षों की सामूहिक आस्था एवं प्रतिष्ठा का प्रतीक है। किसी एक प्रकरण के आधार पर पूरे विश्वविद्यालय की छवि को कटघरे में खड़ा करना उन हजारों लोगों की भावनाओं को भी आहत करता है, जो विश्वविद्यालय के विकास और अकादमिक उन्नयन के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।
बैठक में स्पष्ट किया गया कि विश्वविद्यालय समुदाय किसी भी विद्यार्थी की शिकायत की जाँच के विरुद्ध नहीं है। यदि किसी विद्यार्थी के साथ अन्याय हुआ है तो उसे न्याय मिलना चाहिए और यदि किसी अधिकारी, शिक्षक या कर्मचारी की गलती प्रमाणित होती है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यह शिकायत की जाँच का नहीं, सोशल मीडिया ट्रायल का विरोध है।
लेकिन साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी व्यक्ति को जाँच पूरी होने से पहले सोशल मीडिया पर दोषी घोषित न किया जाए। किसी आरोप की सत्यता का निर्धारण वायरल वीडियो, सोशल मीडिया टिप्पणियों या एकतरफा कथनों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, डिजिटल रिकॉर्ड, साक्ष्यों और विधिसम्मत जाँच के आधार पर होने चाहिए।
बैठक में संबंधित छात्रा के प्रकरण से जुड़े उपलब्ध अभिलेखों, संवादों एवं परीक्षा प्रक्रिया पर भी चर्चा की गई। उपस्थित सदस्यों ने कहा कि पूरे प्रकरण की समय-रेखा, असाइनमेंट जमा करने की स्थिति, संबंधित शिक्षक एवं छात्रा के बीच हुए संवाद, अंक प्रेषित किए जाने की प्रक्रिया तथा परीक्षा पोर्टल पर उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड की निष्पक्ष जाँच आवश्यक है।उपलब्ध अभिलेखों एवं परीक्षा प्रक्रिया की भी निष्पक्ष जाँच हो।
बैठक में उपलब्ध रिकॉर्ड के संदर्भ में कहा गया कि 25 फरवरी 2023 के संवाद में छात्रा द्वारा स्वयं यह बताया गया था कि वह रामनगर में एक जन्मदिन समारोह में है और असाइनमेंट अभी जमा नहीं किया गया है। इसके बाद 24 अप्रैल 2023 को संबंधित शिक्षिका से असाइनमेंट जमा करने की अनुमति माँगे जाने का उल्लेख भी किया गया।
सदस्यों ने कहा कि इन तथ्यों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जानी चाहिए तथा यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि असाइनमेंट वास्तव में निर्धारित समय पर जमा हुआ था अथवा नहीं, संबंधित शिक्षक/विभाग द्वारा अंक कब और किस माध्यम से प्रेषित किए गए, परीक्षा पोर्टल पर क्या रिकॉर्ड उपलब्ध है और बाद में अंक जोड़ने अथवा संशोधित करने का अनुरोध किस आधार पर किया गया।
बैठक में शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी को उसके वास्तविक एवं विधिसम्मत रूप से प्राप्त अंक मिलना उसका अधिकार है। साथ ही परिणाम घोषित होने के बाद किसी अनुपस्थित विद्यार्थी के अंक जोड़ने अथवा संशोधित करने की प्रक्रिया भी अत्यंत संवेदनशील अकादमिक एवं परीक्षा संबंधी विषय है।
इसलिए यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि असाइनमेंट कब जमा हुआ, अंक कब तैयार किए गए, विभाग द्वारा उन्हें कब भेजा गया, परीक्षा पोर्टल पर क्या प्रविष्टियाँ हुईं और बाद में किसी प्रकार के संशोधन का अनुरोध किस प्रक्रिया के अंतर्गत किया गया।
किसी भी पक्ष को दोषी ठहराने से पहले इन सभी प्रश्नों की दस्तावेजी एवं डिजिटल जाँच आवश्यक है।
कुलपति एवं विश्वविद्यालय अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाए जाने पर आपत्ति व्यक्त की गई।
बैठक में इस बात पर विशेष चिंता व्यक्त की गई कि एक प्रशासनिक एवं परीक्षा संबंधी प्रकरण को लगातार व्यक्तिगत आरोपों में परिवर्तित किया जा रहा है तथा कुलपति एवं अन्य विश्वविद्यालय अधिकारियों के संबंध में गंभीर आरोप सोशल मीडिया के माध्यम से प्रसारित किए जा रहे हैं।
शिक्षकों, कर्मचारियों एवं शोधार्थियों ने कहा कि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध कोई शिकायत है तो विश्वविद्यालय लोकपाल, शासन, न्यायालय तथा अन्य सक्षम वैधानिक मंच उपलब्ध हैं। किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को सोशल मीडिया पर आरोपों के आधार पर प्रभावित करना प्राकृतिक न्याय की भावना के अनुरूप नहीं हो सकता।
बैठक में कहा गया कि यदि आरोप सही हैं तो सक्षम एवं स्वतंत्र जाँच में वे प्रमाणित होने चाहिए और यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है, कथित मॉर्फ़ चित्र ए आई आधारित सामग्री एवं भ्रामक डिजिटल सामग्री की साइबर फोरेंसिक जाँच हो।
बैठक में सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ सामग्री के स्वरूप को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई। उपस्थित सदस्यों ने कहा कि कुछ सामग्री में कथित रूप से मॉर्फ्ड अथवा डिजिटल रूप से परिवर्तित चित्र, संदर्भ से काटे गए दृश्य, संपादित वीडियो, भ्रामक वॉयसओवर तथा एआई आधारित सामग्री के उपयोग की आशंका दिखाई देती है।
सदस्यों ने स्पष्ट किया कि इन सामग्रियों की वास्तविकता का निर्धारण केवल तकनीकी जाँच से ही किया जा सकता है। अतः मूल वीडियो एवं ऑडियो फाइलों, स्क्रीन रिकॉर्डिंग, अपलोड हिस्ट्री तथा उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों की साइबर फोरेंसिक जाँच कराई जानी चाहिए।
यदि जाँच में जानबूझकर डिजिटल छेड़छाड़, प्रतिरूपण अथवा किसी व्यक्ति को गलत रूप में प्रस्तुत करने की पुष्टि होती है, तो लागू कानून के अंतर्गत उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
बैठक में इस बात पर भी चिंता व्यक्त की गई कि विश्वविद्यालय के आंतरिक मामलों से संबंधित चयनित एवं अपूर्ण जानकारी बाहरी माध्यमों तक किस प्रकार पहुँच रही है।
सदस्यों ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा आधिकारिक दस्तावेजों, आंतरिक सूचनाओं अथवा प्रक्रियाओं को संदर्भ से काटकर बाहर उपलब्ध कराया गया है और उससे किसी सोशल मीडिया अभियान को सहायता मिली है, तो इसकी भी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
यदि किसी शिक्षक, कर्मचारी, अधिकारी अथवा अन्य संबद्ध व्यक्ति की भूमिका प्रमाणित होती है तो उसके विरुद्ध भी विश्वविद्यालय के नियमों एवं लागू कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
प्रशासनिक एवं न्यायिक प्रक्रियाओं को सोशल मीडिया दबाव से प्रभावित नहीं किया जा सकता
शिक्षकों, कर्मचारियों एवं शोधार्थियों ने कहा कि किसी लंबित प्रशासनिक, परीक्षा संबंधी अथवा न्यायिक प्रकृति के मामले पर लगातार सोशल मीडिया दबाव बनाया जाना गंभीर विषय है।
किसी भी मामले में निर्णय तथ्यों, दस्तावेजों, साक्ष्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए, न कि वायरल वीडियो अथवा सोशल मीडिया ट्रायल के आधार पर।
बैठक में उपस्थित शिक्षकों, कर्मचारियों एवं शोधार्थियों ने कहा कि प्रो. दीवान सिंह रावत के कुलपति के रूप में कार्यकाल के दौरान कुमाऊँ विश्वविद्यालय में शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध, आधारभूत संरचना, नवाचार, राष्ट्रीय रैंकिंग एवं संस्थागत विकास के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं।कुलपति के कार्यकाल की उपलब्धियों को भी वस्तुनिष्ठ रूप से देखा जाए
नई शैक्षणिक एवं शोध सुविधाओं का विकास, आधारभूत संरचना का विस्तार, शोध एवं नवाचार को प्रोत्साहन तथा विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने के प्रयासों को भी वस्तुनिष्ठ रूप से देखा जाना चाहिए।
वक्ताओं ने कहा कि किसी मानवीय भूल से उत्पन्न एक विवाद अथवा आरोप के आधार पर विश्वविद्यालय की समग्र उपलब्धियों और पिछले वर्षों में किए गए संस्थागत प्रयासों को नकार देना उचित नहीं है
बैठक में उपस्थित महिला शिक्षकों, महिला शोधार्थियों एवं छात्राओं ने भी कहा कि उनके संज्ञान में विगत वर्षों के दौरान कुलपति द्वारा महिला शिक्षकों, कर्मचारियों अथवा छात्राओं के साथ किसी अनुचित व्यवहार का कोई प्रमाणित तथ्य नहीं आया है। इसलिए ऐसे गंभीर व्यक्तिगत आरोपों को सक्षम जाँच से पूर्व सोशल मीडिया पर स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
बैठक में विश्वविद्यालय समुदाय द्वारा निम्नलिखित माँगें रखी गईं—
- पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जाँच कराई जाए।
- असाइनमेंट, उपस्थिति, आंतरिक अंक, विभागीय पत्राचार, परीक्षा पोर्टल लॉग एवं परिणाम रिकॉर्ड की दस्तावेजी एवं डिजिटल जाँच कराई जाए।
- यह स्पष्ट किया जाए कि असाइनमेंट निर्धारित समय में जमा हुआ था अथवा नहीं तथा अंक किस स्तर पर और किस तिथि को प्रेषित/अपलोड किए गए।
- परिणाम घोषित होने के बाद अंक जोड़ने अथवा संशोधित करने के अनुरोध की प्रक्रिया एवं वैधानिकता की जाँच की जाए।
- यदि किसी शिक्षक, कर्मचारी, अधिकारी अथवा अन्य व्यक्ति की लापरवाही या अनियमितता प्रमाणित होती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
- कुलपति एवं अन्य अधिकारियों पर लगाए गए व्यक्तिगत आरोपों की भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जाँच हो।
- सोशल मीडिया पर प्रसारित कथित मॉर्फ्ड फोटो, छेड़छाड़ किए गए वीडियो, वॉयसओवर एवं ए आई आधारित सामग्री की साइबर फोरेंसिक जाँच कराई जाए।
- संबंधित डिजिटल सामग्री के स्रोत, संपादन, तथ्यात्मक आधार एवं संदर्भ की जाँच की जाए।
- यदि किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर झूठी, मानहानिकारक अथवा भ्रामक डिजिटल सामग्री तैयार एवं प्रसारित करने की पुष्टि होती है तो लागू कानून के अंतर्गत कार्रवाई की जाए।
- यदि विश्वविद्यालय के भीतर से कोई व्यक्ति चयनित या अनधिकृत जानकारी उपलब्ध कराकर इस प्रकार के अभियान को सहायता प्रदान कर रहा है तो उसकी भूमिका की भी निष्पक्ष जाँच की जाए।
बैठक में विश्वविद्यालय के विभिन्न परिसरों एवं संबद्ध संस्थानों से आए शोधार्थियों, स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं कर्मचारियों ने अपने विचार व्यक्त किए।
छात्र महासंघ अध्यक्ष श्री आशीष कबडवाल, महासंघ उपाध्यक्ष श्री रक्षित बिष्ट, शोधार्थी सुश्री स्वाती जोशी सहित अन्य छात्राओं एवं विद्यार्थियों ने भावुक होकर कहा कि विश्वविद्यालय की गरिमा पर होने वाले किसी भी एकतरफा सोशल मीडिया अभियान से विद्यार्थी समुदाय भी गहराई से आहत है। उन्होंने कुलपति से विश्वविद्यालय को आगे भी नेतृत्व प्रदान करते रहने का आग्रह किया।
डी.एस.बी. परिसर की परिसर निदेशक प्रो. नीता बोरा शर्मा ने संबंधित सोशल मीडिया माध्यम द्वारा कथित रूप से किए जा रहे चरित्र-हनन के प्रयासों की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि पिछले वर्षों में विश्वविद्यालय में हुए विकास एवं शैक्षणिक प्रगति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
प्रो. संजय पंत, प्रो. एच.सी.एस. बिष्ट, प्रो. सावित्री कैड़ा, प्रो. एस.एस. बर्गली एवं प्रो. सुची बिष्ट ने भी कुलपति के कार्यकाल में किए गए प्रयासों का उल्लेख करते हुए महिला कार्मिकों, शिक्षकों एवं छात्राओं के प्रति उनके आचरण एवं व्यवहार की प्रशंसा की तथा सोशल मीडिया पर लगाए जा रहे व्यक्तिगत आरोपों को अत्यंत खेदजनक बताया।
भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री बी.एस. मेहता ने भी बैठक में कुलपति के विरुद्ध कथित दुष्प्रचार की निंदा करते हुए पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जाँच की माँग की
इस अवसर पर कार्यपरिषद् सदस्य श्री अरविन्द पड़ियार एवं अधिवक्ता श्री केवल सती ने भी कथित दुष्प्रचार पर कड़ी आपत्ति व्यक्त करते हुए पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जाँच लोकपाल अथवा सक्षम स्वतंत्र मंच के स्तर पर सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता व्यक्त की।
विश्वविद्यालय कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष श्री आनन्द रावत, प्रदेश संगठन के संरक्षक श्री भूपाल सिंह करायत तथा डी.एस.बी. परिसर, नैनीताल के शिक्षणेत्तर कर्मचारी संघ के अध्यक्ष श्री नन्दा बल्लभ पालीवाल ने भी अपने विचार व्यक्त किए और सोशल मीडिया पर चल रहे कथित एकतरफा दुष्प्रचार की निंदा की।
वक्ताओं ने कहा कि कुमाऊँ विश्वविद्यालय की गरिमा, अकादमिक स्वतंत्रता, प्रशासनिक निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा की रक्षा केवल विश्वविद्यालय प्रशासन की नहीं, बल्कि पूरे विश्वविद्यालय समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी है।
साथ ही मीडिया से भी अपील की गई कि वह किसी भी मामले में आधे-अधूरे तथ्यों, एकपक्षीय दावों और सनसनीखेज प्रस्तुति के बजाय दस्तावेजों, प्रमाणों और सभी संबंधित पक्षों का दृष्टिकोण सामने रखे
बैठक में सैकड़ों छात्र-छात्राओं, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विश्वविद्यालय कर्मचारियों की उपस्थिति रही।


