गोल्डन फर्न के बढ़ते दायरे ने पार्क प्रशासन की बढ़ाई चिंता

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गोल्डन फर्न के बढ़ते दायरे ने पार्क प्रशासन की बढ़ाई चिंता
डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
अपनी जैव विविधता के लिए दुनिया भर में मशहूर फूलों की घाटी नेशनल पार्क आज से खुल जाएगा।12000 फीट की ऊंचाई में 87-5 वर्ग किलोमीटर में फैली फूलों की घाटी में मौसमवार पांच सौ से अधिक प्रजाति के रंग बिरंगे फूल खिलते हैं।जिन्हें देखने के लिए सैकड़ों की संख्या में देशी विदेशी सैलानी प्रतिवर्ष यहां पहुंचते हैं। फूलों की घाटी में देश-विदेश के बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं। हर साल फूलों की घाटी खुलने से पहले वन विभाग की ओर से इसके लिए विशेष तैयारी की जाती है।जिस फूलों की घाटी के दीदार के लिए हजारों की तादाद में सैलानी आते हैं वहां अब एक नए पौधे का कब्जा हो रहा है। पाॅलीगोनम के बाद गोल्डन फर्न ने फूलों की घाटी में अपना दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया है। इसकी वजह से वहां नए फूलों की प्रजातियां पैदा नहीं हो पा रहीं हैं। हालांकि पार्क प्रशासन ने इसे उखाड़ फेंकने का काम शुरू कर दिया है। बता दें कि पाॅलीगोनम को जड़ से उखाड़ने के लिए पार्क की ओर से लाख रुपये सालाना खर्च कर रहा है। फूलों की घाटी में पॉलीगोनम के बाद अब गोल्डन फर्न ने अपनी जड़ें जमा दी हैं। बामण धोड़ से पिकनिक स्पॉट तक घाटी में गोल्डन फर्न फैल गया है। हालांकि पार्क प्रशासन की ओर से इसका दायरा सीमित बताया जा रहा है। गोल्डन फर्न की वजह से रंग-बिरंगे फूलों के उगने पर संदेह पैदा होने लगा है। नंदा देवी पार्क प्रशासन की ओर से इसके उन्मूलन के लिए कार्ययोजना बनाने का काम शुरू कर दिया है। जोशीमठ नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के डीएफओ ने बताया कि फूलों की घाटी में गोल्डन फर्न चिंताएं बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि पार्क प्रशासन का ध्यान फिलहाल घाटी से पॉलीगोनम के उन्मूलन पर है। घाटी में गोल्डन फर्न के सर्वेक्षण के बाद जल्द ही इसके उन्मूलन के लिए भी प्रपोजल तैयार किया जाएगा। फूलों की घाटी पर रिसर्च करने वाली इंग्लैंड की शोधकर्ता जाॅन मेरी की 1939 में ग्लेशियर में दबने से मौत हो गई थी और उसकी कब्र वहीं बनाई गई है। उस कब्र को देखने के लिए बड़ी तादाद में विदेशी सैलानी वहां आते हैं। कभी रंग-बिरंगे फूलों से घिरे कब्र के आसपास अब गोल्डन फर्न ने अपना दायरा बढ़ा दिया है। गौर करने वाली बात है कि गोल्डन फर्न का पौधा करीब आधा मीटर का होता है और इसके पत्ते चैड़े और हल्के पीले रंग के होते हैं। यह अपने इर्द-गिर्द फूलों को पनपने नहीं देता है। फूलों की घाटी में एक दशक पहले पोलीकोनियम नामक एक फूल ने पैर पसारते हुए फूलों की घाटी को काफी नुकसान पहुंचाया है। इस पौध ने अपने आसपास के सभी फूलों को नष्ट कर दिया है, जिसको देखते हुए नंदादेवी वायोस्फियर रिजर्व ने इसे नष्ट करने पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिया, मगर अभी भी यह पौधा घाटी में मौजूद है। इस पौधे से ही नंदादेवी वन विभाग निजात नहीं पाया था कि अब एक नया पौधा जिसे गोल्डन फर्न कहा जा रहा है, ने घाटी में पांव पसारने शुरू कर दिये हैं। तेजी से यह पौधा फैल रहा है। यदि इसे रोकने के ठोस उपाय नहीं किये गये तो फूलों की घाटी का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। गोल्डन फर्न नामक यह पौधा अपने आसपास के पौधों को नष्ट कर देता है। नंदादेवी वन सरंक्षण के अधिकारियों की माने तो इस पौधे को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है और जल्द ही इस पौध से घाटी को निजात दिलायी जायेगी। राष्ट्रीय उद्यान के लिए खतरे का सबब बन सकती है। पिछले 10 साल से वन विभाग इससे पार पाने की कोशिशों में जुटा है, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है।चमोली जिले में सिखों के प्रमुख धार्मिक स्थल हेमकुंड साहिब मार्ग पर घांघरिया से पांच किमी के फासले पर 87.50 वर्ग किमी में फैली है फूलों की घाटी। उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित इस घाटी में फूलों की 500 से अधिक प्रजातियां मिलती हैं। मानवीय दबाव बढ़ने से घाटी की जैव विविधता पर खतरे की आशंका के मद्देनजर पार्क प्रशासन ने नई गाइड लाइन जारी की। इसके तहत पर्यटकों की संख्या पर अंकुश लगाया जा रहा है। इससे पहले प्रतिदिन के लिए कोई संख्या तय नहीं थी।उन्होंने बताया कि घाटी की सैर के लिए पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रख नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क अपनी वेबसाइट भी है। इससे पर्यटक ऑन लाइन बुकिंग कर सकेंगे। बताया कि घाटी में प्लास्टिक का सामान ले जाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है, लेकिन सैलानी अपने साथ पानी की बोतल ले जा सकते हैं। इसके लिए उन्हें प्रति बोतल पांच सौ रुपये जमा कराने होंगे। यह धनराशि बोतल वापस लाने पर लौटा दी जाएगी। नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क प्रशासन ने फूलों की घाटी में पर्यटकों की संख्या पर अंकुश लगाया है। पार्क की नई गाइड लाइन के अनुसार अब एक दिन में 300 से ज्यादा पर्यटकों को फूलों की घाटी नहीं भेजा जाएगा। इसका मकसद घाटी की जैव विविधता को संरक्षित करना है। समुद्रतल से 12,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित विश्व धरोहर फूलों की घाटी के दीदार को हर वर्ष हजारों सैलानी आते हैं। 87.5 वर्ग किलोमीटर में फैली घाटी में इन दिनों पांच सौ से ज्यादा दुर्लभ प्रजातियों के फूल खिलते हैं। इसके अलावा यहां वन्य जीवन भी फल-फूल रहा है।
लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय है.

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