महादेवी से रामगढ़ के नैसर्गिक सौंदर्य का बखान जि‍सके बाद रहने के लि‍ए खरीदा भवन

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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालयए देहरादून उत्तराखंड
उत्तराखंड है ही ऐसी जगह जहां की हर बात निराली है जहां का हर गांव निराला है वहां की कहानियां भी निराली है। नैनीताल जिले के मुक्तेश्वर.रामगढ़ इलाके में अनेक स्थानों से हिमालय की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। तकरीबन 180 डिग्री के विस्तार में सामने फ़ैली हिमाच्छादित पर्वत श्रेणियां दिन भर में अपने हज़ार रूप बदलती हैं। यह इलाका बहुत लम्बे समय से लिखने पड़ने वालों का प्रिय रहा है। उत्तराखण्ड के विविध जनपदों में प्रमुख जनपद नैनीतााल संस्कृत साहित्यिक एवं आर्थिक सहित उपर्युक्त वर्णित आधारों को स्वयं समाहित करता हुआ इस पर्वतीय राज्य का सही अर्थों में आदर्श प्रतिनिधित्व करता है। इसी कारण प्रागेतिहासिक आधारों पर आदिगुरू शंकराचार्य से लेकर चीनी यात्री ह्वेनसांगए महर्षि अरविन्दए नारायण स्वामीए स्वामी विवेकानंदए बाबा नीम करोलीए बाबा हेड़ा खानए महात्मा गांधीए जिम कॉर्बेटए आधुनिक मीरा महादेवी वर्माए आचार्य नरेन्द्र देव आदि ने मानव जाती के कल्याण हेतु स्वयं द्वारा निर्धारित उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए जनपद नैनीताल को अपनी कर्मभूमि तथा यात्रा मार्ग बनाया। छायावादी आन्दोलन के चार प्रमुख स्तंभों में एक महादेवी वर्मा को उत्तराखंड की नैसर्गिक खूबसूरती भा गई थी। यही कारण था कि उन्होंने अपनी कई कालजयी रचनाएं रामगढ़ में मीरा कुटीर में ही लिखीं। उन्हें रामगढ़ पहुंचने की प्रेरणा कहां से मिली। दरअसल उनसे यहां की खूबसूरती का जिक्र उनसे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने किया था। जिसके बाद उन्होंने यहां आने का फैसला किया। जब वह यहां पहुंचीं तो न सिर्फ यहां की खूबसूरती देखकर मुग्ध हुईं बल्कि रहने के लिए घर भी खरी लिया और नाम रखा मीरा कुटीर। मीटा कुटीर आज भी साहित्यिक गितविधियों का एक बड़ा केन्द्र है। जब 1933 में वे शान्तिनिकेतन गयी तो वहां उनकी भेंट ठाकुर रवीन्द्रनाथ टैगोर से हुई। जिन्होंने उनसे रामगढ़ की नैसर्गिक सुन्दरता का विस्तार में ज़िक्र किया। अगले साल महादेवी वर्मा ने बद्रीनाथ की यात्रा की। वहां से वापस आते हुए उन्हें टैगोर की सलाह याद थीए तो वह एक रात के लिए रामगढ़ के सामने स्थित उमागढ़ नाम के छोटे से गांव में ठहरीं। उन्हें यह स्थान इतना भाया कि उन्होंने 1936 में गर्मियों में आकर रहने के लिए यहाँ एक भवन खरीदा। जिसका नाम मीरा कुटीर रखा गया। इस भवन में रह कर महादेवी ने अनेक रचनाएं लिखीं। अपनी कालजयी रचना ष्दीपशिखाष् ;1942द्ध में उन्हेंने यहीं लिखी। वह जब तक जीवित रहींए अपने साथी कवि.साहित्यकारों को यहाँ रहने और रचना करने के लिए अक्सर बुलाया। उनके बुलावे पर यहाँ आने वालों में धर्मवीर भारतीए इलाचंद्र जोशी और सुमित्रानंदन पंत जैसे अग्रणी साहित्यकार शामिल रहे। विश्व.भारती विश्वविद्यालय रामगढ़ में होताष् विषयक अपने एक लेख में लिखा है कि टैगोर विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ थे और उनका मानना था कि विद्यार्थियों को गुरूकुल पद्धति में प्रकृति के सानिध्य में शिक्षित किया जाना चाहिए। उनकी कल्पना विश्व.भारती विश्वविद्यालय के मोटो में प्रतिबिंबित होती हैए श्यत्र विश्वम भवत्येक निडमश् अर्थात जहां सम्पूर्ण विश्व एक घोंसले में बस जाए। प्रो0 तिवारी आगे लिखते हैं कि उन्ही की प्रेरणा से कवियत्री महादेवी वर्मा ने जहाँ रामगढ़ में आवास ;मीरा कुटीरद्ध बनवाया वहीं रामधारी सिंह दिनकर तथा सच्चिदानंद हृदयानंद वात्स्थायन अज्ञेय भी यहाँ लंबे समय तक रहे।छायावाद की लोकप्रिय कवयित्री महादेवी वर्मा रामगढ़ में गुरूदेव की मौजुदगी को याद करते हुए लिखती हैं कि ष्हिमालय के प्रति मेरी आसक्ति जन्मजात है। उसके पर्वतीय अंचलों में मौन हिमानी और मुखर निर्झरोंए निर्जन वन और कलरव.भरे आकाश वाला रामगढ़ मुझे विशेष रूप् से आकर्षित करता रहा है। वहीं नन्दा देवीए त्रिशूल आदि हिम देवताओं के सामने निरन्तर प्रणाम से समाधिस्थ जैसे एक पर्वत शिखर के ढाल पर कई एकड़ भूमि के साथ एक छोटा.सा बंगला कवीन्द्र का था जो दूर से उस हरीतिमा में पीले केसर के फूल जैसा दिखाई देता था। उसमें किसी समय वे अपनी रोगिणी पुत्री के साथ रहे थे और संभवतः वहां उन्होने शान्ति.निकेतन जैसी संस्था की स्थापना का स्वप्न भी देखा थाश्। महान कवयित्री महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्चए 1907 को हुआ। हिंदी साहित्य में निरालाए प्रसादए पंत के साथ साथ महादेवी वर्मा को छायावाद युग का एक महान स्तम्भ माना जाता है। महादेवी गद्य विधा की भी महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थीं। उन्हें साहित्य अकादेमी फेलोशिपए ज्ञानपीठ और पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया। उनकी कविताओं में अन्य भावों के अलावा विषाद की अभिव्यक्ति मुख्य रूप से होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी संबोधित किया गया है। पद्म भूषणए 1979ए सेकसरिया पुरस्कारए 1942ए द्विवेदी पदकए 1943 मंगला प्रसाद पुरस्कारए 1943 भारत भारती पुरस्कारए 1956 साहित्य अकादेमी फेलोशिपए 1982 ज्ञानपीठ पुरस्कारए 1988 पद्म विभूषण महज सात साल की उम्र में उनकी कविताए देश की प्रसिद्ध पत्र.पत्रिकाओं में आने लगीण् महादेवी जी ने पंचतंत्र और संस्कृत का अध्ययन किया इनको एक प्रतियोगिता में चांदी का कटोरा मिला था यह कटोरा उन्होंने गाँधी जी को दे दिया था महादेवी वर्मा कवि सम्मेलन में भी जाने लगी थी इतना ही नही उन्होंने सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान कवी सम्मेलन में अपनी कविताए भी सुनाती थी और हमेशा ही प्रथम पुरस्कार मिलता था ण् जब महादेवी केवल 9 साल की थी तब इनका विवाह हो गया था लेकिन महादेवी जी को सांसारिकता से कोई लगाव नहीं था वह बौद्ध से लगाव था एक भिक्षुणी बनना चाहतीं थीं विवाह के बाद भी इन्होने अपनी पढाई जारी राखीण्उन्होंने भारतीय संस्कृति के संबंध में कभी समझौता नहीं किया हमेशा से ही इन्होने स्वाभिमाननी नारी का जीवन जिया है हिंदी भाषा को लेकर महादेवी का कहना था की हिन्दी भाषा के साथ हमारी अस्मिता जुड़ी हुई हैण् रामगढ़ मीरा कुटीरष् के कुछ हिस्से उसी तरह संजोकर रखे गए हैं जैसे कि वह महादेवी वर्मा के समय में थेण् उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुयें आज भी सलामत हैंण् साल में दो.एक दफा यहाँ साहित्यकारों का जमावड़ा भी लगता हैण् महादेवी कि याद में कुछ अनुष्ठानिक कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैंउनकी लिखी किताबें सब कुछ आज मिलेगाण्महादेवी वर्मा ने यहां रहकर ना सिर्फ साहित्य सृजन किया बल्कि ग़रीब बच्चियों को शिक्षा देकर आत्म निर्भर बनायाण्ये मीरा कुटीर पुराने साहित्यकारों को पुरानी यादों से भर देती है और युवाओं को ऊर्जा देती हैण् महादेव के निधने के बाद लम्बे समय तक यह भवन उपेक्षा का शिकार बना रहा। महादेवी के सलाहकार रामजी पाण्डेयए उपन्यासकार लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही और कवि.सम्पादक वीरेन डंगवाल के प्रयासों से सरकार ने इस इमारत में दिलचस्पी ली। इसे नैनीताल स्थित कुमाऊँ विश्वविद्यालय की देखरेख में एक साहित्य.संग्रहालय का रूप दे दिया गया। आज इस भवन में महादेवी वर्मा सृजन पीठ नामक महत्वपूर्ण साहित्यिक केंद्र संचालित होता है। यहां वर्ष भर होने वाले विविध कार्यक्रमों में देश के युवा.वरिष्ठ लेखल.रचनाकारों आना होता रहता है।साहित्यिक महत्व को समेटे इस मीरा कुटीर के संरक्षण की हैण्
वे मुस्काते फूल नहीं जिनको आता है मुरझाना
वे तारों के दीप नहीं जिनको भाता है बुझ जाना श्
लेकिन वे आज भी भारत के साहित्य आकाश में ध्रुव तारे की भांति प्रकाशमान हैंण्

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उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर चुके हैं वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं

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