पहली पुण्यतिथि पर साहित्यिक रूप में दी श्रद्धांजलि-साहित्यकार व पीसीएस ललित मोहन रयाल

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नैनीताल- साहित्यकार व पीसीएस ललित मोहन रयाल ने अपने दिवंगत पिता मुकुंद राम रयाल को पहली पुण्यतिथि पर साहित्यिक श्रद्धांजलि दी है। उन्होंने कारी तू कबि ना हारी नामक शीर्षक से लिखी किताब में पिता और पुत्र के बीच के संबंधों तथा शिक्षक पिता की समाज सेवा व शिक्षण के प्रति समर्पण, बौद्धिक क्षमता, ज्ञान, जीवन में पिता की महत्ता को खूबसूरती से सजाया है। प्रसिद्ध साहित्यिक लीलाधर जगूड़ी ने इस किताब में अपनी रोचक बातोों की जानकारी दी है। साथ ही गढ़वाली मिश्रित हिंदी भाषा की तारीफ करते हुए लिखा है कि भाषा भी भोजन की तरह कई स्वाद देती है । इस किताब का विमोचन 22 फरवरी की प्रथम पुण्यतिथि पर होगा।
साहित्यकार रयाल के पिता का पिछले साल निधन हो गया था। पिता के क्रियाकर्म के दौरान ही उन्होंने किताब लिखना शुरू कर दिया था। अतीत के स्मरण को लिपिबद्ध किया। किताब में पिता के साथ बिताए उन पलों का मार्मिक ढंग से उल्लेख किया है। उन्होंने पिता को श्रद्धांजलि के बहाने गढ़वाल के लोकजीवन में आये बदलाव, बढ़ते शहरीकरण, पलायन, ग्रामीण जीवन का बेहतरीन वर्णन किया है। ज्योतिषी व कर्मकांड की महत्ता भी बताई है, गांव व रयाल जाति के उद्भव का इतिहास भी पढ़ाया है। प्रसिद्ध साहित्यकार लीलाधर जगूड़ी के शब्दों में, चाहे अनचाहे एक सुलभ रहने वाला व्यक्ति है पिता। वह उपदेशक, सुधारक और दंड पुरस्कार समझाने वाला, प्यार और एकता व भय पैदा करने वाला व्यक्ति है। दुनियां में ढूंढने निकलेंगे तो पिता की सबसे ज्यादा छवियां और भंगिमाएं बिखरी मिलेंगी। माता के साथ पिता के अलग दायित्व दिखने लगते हैं। माता के बिना पिता की भूमिका कई तरह से बदल जाती है। रयाल ने अपने पिता को कर्मयोगी कहते हुए लिखा है कि यह साधारण शिक्षक की जीवनी है। गृहस्थी के पचड़ों में फंसा मास्टर आदमी। उन्होंने ताउम्र ग्रामीण जीवन जिया। नियम कायदों का हमेशा पालन किया। पिता पुत्र के बिछुड़ने का गम, उनके निधन पर परिवार की आप बीती का दिल की गहराइयों से निकले शब्दों से सजाया है। उन्होंने किताब में विद्यार्थी जीवन के उन पहलुओं का भी उल्लेख किया है, जो हर किसी के जीवन के अनमोल पल होते हैं। साहित्यकार जगूड़ी लिखते हैं, पहाड़ी जीवन भी कुछ कुछ वैदिक सा, कुछ कुछ, ऋषि मुनियों जैसी झलक दिखलाता रहता है। पशुओं के बीच कामकाज के अलावा कुछ अन्य संवाद भी चलते रहते हैं। रयाल के लेखन में अलग किस्म का, ना दलदली किस्म का, न सूखे तालाब जैसा ,गद्य है। किताब में मनचाहा घालमेल किया है, चाहते तो पारंपरिक प्रस्तुति दे सकते थे। रयाल ने 21 अध्याय की किताब में उन्होंने लोकजीवन के उन किस्से कहानियों के बारे में भी उल्लेख किया है, जो आज की शहरीकरण की जिंदगी में गुम हो गए हैं मगर एक पीढ़ी में इसको संरक्षण करने की छटपटाहट है। कुल मिलाकर पिता पुत्र के रिश्तों की यह किताब साहित्य के हर पहलु को छूती है।

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