आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष को पड़ने वाली देवशयनी एकादशी का क्या है महत्व

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देवशयनी एकादशी व्रत। हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष 24 एकादशी होती हैं। जब अधिक मास या मलमास आता है तब इनकी संख्या 26 हो जाती है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। कहीं-कहीं इस तिथि को पदमनाभा भी कहते हैं। इस दिन से भगवान श्री हरि विष्णु क्षीर सागर में शयन करते हैं और फिर लगभग 4 माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर उन्हें उठाया जाता है इस एकादशी को हरी बोधनी एकादशी कहा जाता है। इसी बीच के अंतराल को ही चातुर्मास कहा गया है। देवभूमि उत्तराखंड में इस दिन को तुलसी एकादशी भी कहते हैं। प्रत्येक घर में इस दिन तुलसी के पौधे रुपए जाते हैं। और व्रत उपवास किया जाता है। तुलसी के पौधे के समीप प्रत्येक दिन दिया जलाया जाता है। और प्रत्येक दिन पौधे को जल अर्पण किया जाता है। और तब से लेकर हरि बोधनी एकादशी तक प्रतिदिन दीपक जलाया जाता है। देवशयनी एकादशी व्रत कथा।। धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा हे केशव आषाढ़ शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इस व्रत के करने की विधि क्या है? और किस देवता का पूजन किया जाता है? श्री कृष्ण कहने लगे की हे युधिष्ठिर जिस कथा को ब्रह्मा जी ने नारद जी से कहा था वही मैं तुमसे कहता हूं। एक समय नारद जी ने ब्रह्मा जी से यही प्रश्न किया था। तब ब्रह्माजी ने उत्तर दिया की है नारद तुमने कलयुग जीवन के उद्धार के लिए बहुत उत्तम प्रश्न किया है। क्योंकि देव शयनी एकादशी का व्रत सब व्रतों में उत्तम है। इस व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। और जो मनुष्य इस व्रत को नहीं करते वह नर्क गामी होते हैं। इस व्रत के करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। अब मैं तुमसे एक पौराणिक कथा कहता हूं। तुम मन लगाकर सुनो। सूर्यवंश में मांधाता नाम का एक चक्रवर्ती राजा हुआ है। जो सत्यवादी और महान प्रतापी था। वह अपनी प्रजा का पुत्र की भांति पालन किया करता था। उसकी सारी प्रजा धन-धान्य से भरपूर और सुखी थी। उसके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था। एक समय उस राजा के राज्य में 3 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई और अकाल पड़ गया। प्रजा अन्य की कमी के कारण अत्यंत दुखी हो गई। अन्य के न होने से राज्य में यज्ञ आदि भी बंद हो गए। 1 दिन प्रजा राजा के पास जाकर कहने लगी कि हे राजा सारी प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार रही है क्योंकि समस्त विश्व की सृष्टि का कारण वर्षा है। वर्षा के अभाव से अकाल पड़ गया है। और अकाल से प्रजा मर रही है। इसलिए हे राजन कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे प्रजा का कष्ट दूर हो। राजा मांधाता कहने लगे कि आप लोग ठीक कह रहे हैं। वर्षा से ही अनु उत्पन्न होता है। और आप लोग वर्षा न होने से अत्यंत दुखी हो गए हैं। मैं आप लोगों के दुखों को समझता हूं। ऐसा कहकर राजा कुछ सेना को साथ लेकर वन की तरफ चल दिया। वह अनेक ऋषि यों के आश्रम में भ्रमण करता हुआ अंत में ब्रह्मा जी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचा। वहां राजा के घोड़े से उतर कर अंगिरा ऋषि को प्रणाम किया। मुनि ने राजा को आशीर्वाद देकर कुशल सेन के पश्चात उनसे आश्रम में आने का कारण पूछा। राजा ने हाथ जोड़कर विनीत भाव से कहां की हे भगवान सब प्रकार से धर्म पालन करने पर भी मेरे राज्य में अकाल पड़ गया है। इससे प्रजा अत्यंत दुखी है। राजा के पापों के प्रभाव से ही प्रजा को कष्ट होता है ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। जब मैं धर्मानुसार राज्य करता हूं तो मेरे राज्य में अकाल कैसे पड़ गया? इसके कारण का पता मुझको अभी तक नहीं चल सका। अब मैं आपके पास इसी संदेश को निवृत्त कराने के लिए आया हूं। कृपा करके मेरे इस संदेह को दूर कीजिए। साथ ही प्रजा के कष्ट को दूर करने का कोई उपाय बताइए इतनी बात सुनकर ऋषि कहने लगे कि हे राजन यह सतयुग सब युगों में उत्तम है। इसमें धर्म को चारों चरण सम्मिलित हैं अर्थात इस युग में धर्म की सबसे अधिक उन्नति है। लोग ब्रह्मा की उपासना करते हैं। और केवल ब्राह्मणों को ही वेद पढ़ने का अधिकार। ब्राह्मण ही तपस्या करने का अधिकार रख सकते हैं। परंतु आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। इसी दोष के कारण आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। इसलिए यदि आप प्रजा का भला चाहते हो तो उस शूद्र का वध कर दो। इस पर राजा कहने लगा कि महाराज में इस निर अपराधी तपस्या करने वाले शूद्र को किस तरह मार सकता हूं। आप इस दोष से छूटने का कोई दूसरा उपाय बताइए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन यदि तुम अन्य उपाय जानना चाहते हो तो सुनो। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी व्रत का विधिपूर्वक व्रत करो। व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी। और प्रजा सुख प्राप्त करेगी। क्योंकि इस एकादशी का व्रत सब सिद्धियों को देने वाला है और समस्त उपद्रवी को नाश करने वाला है। इस एकादशी का व्रत तुम प्रजा सेवक तथा मंत्रियों सहित करो। मुनि के वचनों को सुनकर राजा अपने नगर को वापस आया और उसने विधि पूर्वक देवशयनी एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से वर्षा हुई और प्रजा को सुख पहुंचा। अतः इस एकादशी का व्रत सभी मनुष्य को करना चाहिए। यह बरात इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति को देने वाला है। इस कथा को पढ़ने और सुनने से भी मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है। इस बार सन् 2021 में यह व्रत 20 जुलाई को मंगलवार के दिन है। लेखक श्री पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल

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