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द्वादश ज्योर्तिलिंगों में एक जागेश्वर धाम
डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
उत्तराखंड को देव भूमि भी कहा जाता है। हर रोज़ यहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए आते है। केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे हिंदू धर्म के अनेकों पवित्र स्थल यहाँ स्थित है, जिसकी वजह से दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं। उत्तराखंड में शिव का एक ऐसा धाम भी है, जो जिसकी महिमा और रहस्य इसे बेहद खास बनाता है। इस पवित्र स्थल का नाम है, “जागेश्वर धाम” या “जागेश्वर घाटी मंदिर”। वैसे तो भारत के अधिकतर राज्यों में देवो के देव महादेव के कई धर्म स्थल हैं, लेकिन इस धाम का वर्णन शिव पुराण, लिंग पुराण और स्कंद पुराण में भी मिलता हैउत्तराखंड में अल्मोड़ा के पास स्थित भगवान शिव का धाम जागेश्वर धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यह स्थान 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है। यह स्थान भगवान शिव एवं सप्तऋषियों की तपोस्थली है। जागेश्वर धाम में दुनिया का पहला शिवलिंग है जहां से शिवलिंग की पूजा आरंभ हुई। इस शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है। यहां सप्त ऋषियों ने शिवलिंग की स्थापना कर आराधना की।जिनमें से एक ही स्थान पर छोटे-बड़े 224 मंदिर स्थित हैं। सभी मंदिर का निर्माण बड़ी-बड़ी शिलाओं को एक के ऊपर एक रखकर किया गया है। मुख्य मंदिर में विशाल शिवलिंग स्थापित है। इसकी दीवारों पर महामृत्युंजय मंत्र लिखा हुआ है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं, जिसका भारी दुरुपयोग होने लगा। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य यहां आए और उन्होंने इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। मंदिर परिसर में देवदार का वृक्ष है जो नीचे से एक ही है लेकिन ऊपर जाकर दो भागों में विभाजित हो जाता है। इस वृक्ष को माता पार्वती और भगवान शिव का युगल रूप प्रतीक माना जाता है। यहां आने वाले सभी श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं भगवान भोलेनाथ अवश्य पूरी करते हैं।उत्तराखंड में कांवड़ यात्रा की मनाही के बीच राज्य के प्रसिद्ध तीर्थ स्थान जागेश्वर धाम में हर साल सावन के महीने में लगने वाले मेले का आयोजन इस साल नहीं किया जाएगा। एसडीएम और जागेश्वर धाम कमेटी के बीच एक बैठक के बाद आपसी सहमति के आधार पर यह फैसला लिया गया। कोविड 19 संक्रमण के प्रकोप को देखते हुए इस सालाना मेले को रद्द किए जाने का निर्णय लिया गया है और अहम बात यह भी है कि पिछले साल 2020 में भी इस मेले के आयोजन को मंज़ूरी नहीं दी गईथी।इस साल 16 जुलाई से शुरू होने जा रहे सावन के महीने से पारंपरिक मेले को शुरू होना था, जो हर साल सावन के महीने से ही शुरू होता रहा है। लेकिन खबरों में कहा गया कि इस बार भी कोरोना संक्रमण के मद्देनज़र इस बार मेले को लेकर सख्ती बरती गई है। हालांकि श्रद्धालुओं के लिए राहत की बात यह है कि वो पहले से बुकिंग करके और कोविड प्रोटोकॉल का पालन करके तीर्थ स्थान में दर्शन कर सकेंगे। यहां 124 बड़े और छोटे मंदिर हैं जो हरे पहाड़ों कि पृष्ठभूमि और जटा गंगा धारा कि गड़गड़ाहट के साथ बहुत खूबसूरत व सुंदर दिखते हैं। ए एस आई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) के अनुसार, मंदिर गुप्त और पूर्व मध्ययुगीन युग के बाद और 2500 वर्ष है। मंदिरों के पत्थरों, पत्थर की मूर्तियों और वेदों पर नक्काशी मंदिर का मुख्य आकर्षण है। मंदिर का स्थान ध्यान के लिए भी आदर्श है।जहां पर महादेव के पैरों के निशान नजर आते हैं। महादेव के इन पैरों के निशान के बारे में ऐसी प्रथा है कि जब पांडव स्वर्ग जा रहे थे तब पांडवों की इच्छा महादेव के दर्शन करने और उनके सानिध्य में रहने की हुई। उधर महादेव ध्यान करने के लिए कैलाश पर्वत जाना चाहते थे। किन्तु पांडव इस बात से सहमत नहीं थे। इस पर महादेव पांडवों को चकमा देकर कैलाश पर्वत पर चले गए थे। ऐसा कहा जाता है कि जहां से महादेव ने कैलाश पर्वत जाने के लिए प्रस्थान किया था, उसी जगह पर आज भी उनके पैरों के निशान देखे जा सकते हैं।

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