एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष पड़ने वाली पापमोचनी एकादशी व्रत का क्या है अर्थ

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पापमोचनी एकादशी व्रत पापमोचनी का अर्थ है पाप हरने वाली, यह एकादशी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को होती है, इस वर्ष यह सात अप्रैल को पड रही है, पुराणों में पापमोचनी एकादशी व्रत रखना वे हद फलदायी माना गया है, कहा जाता है कि विकट से विकट स्थिति में पापमोचनी एकादशी व्रत रखने से श्री हरि की कृपा प् आप्त होती है, इस कथा में भी भगवान श्री कृष्ण और धर्म राज युधिष्ठिर संवाद है, धर्म राज युधिष्ठिर पूछते हैं हे जनार्दन चैत्र मास कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, तथा इसकी क्या विधि है, कृपा करके आप मुझे बताये, श्री भगवान बोले हे राजनचैतमास एकादशी का नाम पापमोचनी एकादशी है, इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पापौ का नाश होता है, यह व्रत में उत्तम व्रत है, इस पापमोचनी एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन से समस्त पापौ का नाश होता है, एक समय देवर्षि नारद ने जगत पिता व्रह्माजी से कहा आप मुझसे चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी विधान कहिये व्रह्माजी कहने लगे कि हे नारद चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी पापमोचनी एकादशी के रूप में मनाई जाती है, इस दिन भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है, इसकी कथा के अनुसार चित्र रथ नामक एक रमणीक वन था, इस वन में देवराज इन्द्र गंधर्व कन्याओं तथा देवताओं सहित स्वच्छंद बिहार करते थे, एक बार मेधावी नामक ऋषि भी वहाँ पर तपस्या कर रहे थे, वे ऋषि शिव उपासक तथा अप्सराएँ शिव द्रोहिणी थी, एक बार कामदेव ने मुनि का तप भंग करने के लिए उन्के पास मंजुघोषा नामक अप्सरा को भेजा, युवा अवस्था वाले मुनि अप्सरा के हाव भाव नृत्य गीत तथा कटाक्षों पर काम मोहित हो गये, रति क्रिडा करते हुए 57वर्ष व्यतीत हो गये, एक दिन मंजुघोषा ने देवलोक जाने की आज्ञा मांगी उसके द्वारा आज्ञा मागने पर मुनि को भान आया और उनहे आत्मज्ञान हुआ कि मुझे रसातल पंहुचाने का एक मात्र कारण अप्सरा मंजुघोषा हीं है, क्रोधित होकर उनहोंने मंजुघोषा को पिशाचिनी होने का श्राप दिया, श्राप सुनकर मंजुघोषा कांपते हुए ऋषि से मुक्ति का उपाय पूछने लगी तब मुनि श्री ने पापमोचनी एकादशी व्रत रखने को कहा और अप्सरा को मुक्ति का उपाय बताकर अपने पिता च्यवन ऋषि के आश्रम पंहुचे पुत्र के मुख से श्राप देने की बात सुनकर च्यवन ऋषि ने पुत्र की घोर निंदा की तथा उनहे चैत्र कृष्ण एकादशी व्रत करने की आज्ञा दी व्रत के प्रभाव से मंजुघोषा पिशाचिनी देह से मुक्त होकर देवलोक चली गयी अत:हे नारद जो कोई मनुष्य विधि पूर्वक इस व्रत का महात्म्य को पढता है और सुनता है उसे सारे संकटौ से भी मुक्ति मिल जाती है, लेखक पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल।

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