प्राकृतिक श्रोतों के सूखने से पहाड़ पर गहरा रहा है पानी का संकट

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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड

रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून रहीम दास जी का यह दोहा आज के परिपेक्ष्य में सटीक साबित हो रहा है। पानी की बर्बादी और जल स्रोतों की अवहेलना कितनी महंगी पड़ती है, इसका आभास गर्मी के दिनों में होता है। बारिश न होने से पेयजल योजनाओं के स्रोतों में पानी का स्तर लगातार कम हो रहा है तो कई नौले पूरी तरह सूख गए हैं। आलम यह है कि जल संस्थान को पेयजल योजनाओं से पानी की नियमित और पर्याप्त आपूर्ति करना मुश्किल हो रहा है। दूसरी तरफ गांवों में सूख रहे नौले पेयजल संकट के समय कोढ़ में खाज का काम कर रहे हैं।उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में जल की आपूर्ति का परंपरागत साधन नौला रहा है। सदियों तक पेयजल की निर्भरता इसी पर रही है। नौला मनुष्य द्वारा विशेष प्रकार के सूक्ष्म छिद्र युक्त पत्थर से निर्मित एक सीढ़ीदार जल भण्डार है, जिसके तल में एक चौकोर पत्थर के ऊपर सीढ़ियों की श्रंखला जमीन की सतह तक लाई जाती है। सामान्यतः सीढ़ियों की ऊंचाई और गहराई 4 से 6 इंच होती है, और ऊपर तक लम्बाई – चौड़ाई बढ़ती हुई 5 से 9 फीट (वर्गाकार) हो जाती है। नौले की कुल गहराई स्रोत पर निर्भर करती है। आम तौर पर गहराई 5 फीट के करीब होती है ताकि सफाई करते समय डूबने का खतरा न हो। नौला सिर्फ उसी जगह पर बनाया जा सकता है, जहाँ प्रचुर मात्रा में निरंतर स्रावित होने वाला भूमिगत जल विद्यमान हो। इस जल भण्डार को उसी सूक्ष्म छिद्रों वाले पत्थर की तीन दीवारों और स्तम्भों को खड़ा कर ठोस पत्थरों से आच्छादित कर दिया जाता है। प्रवेश द्वार को यथा संभव कम चौड़ा रखा जाता है। छत को चारों ओर ढलान दिया जाता है ताकि वर्षाजल न रुके और कोई जानवर न बैठे।आच्छादित करने से वाष्पीकरण कम होता है और अंदर के वाष्प को छिद्र युक्त पत्थरों द्वारा अवशोषित कर पुनः स्रोत में पहुँचा दिया जाता है। मौसम में बाहरी तापमान और अन्दर के तापमान में अधिकता या कमी के फलस्वरूप होने वाले वाष्पीकरण से नमी निरंतर बनी रहती है। सर्दियों में रात्रि और प्रातः जल गरम रहता है और गर्मियों में ठण्डा। नौले का शुद्ध जल मृदुल, पाचक और पोषक खनिजों से युक्त होता है। लगभग पांच-छह दशक पूर्व तक पर्वतीय ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल का एकमात्र स्रोत नौला था। नौलों की देखभाल और रखरखाव सभी मिलजुलकर करते थे। प्रातःकाल सूर्योदय से पहले घरों की युवतियाँ नित्य कर्म से निवृत्त हो तांबे की गगरी लेकर पानी लेने नौले पर साथ साथ जाती, बतियाती, गुनगुनाती, जल की गगरी सिर पर रख कतारबद्ध वापस घर आती, अपने अपने काम में जुट जाती थी। समय समय पर परिवार के अन्य सदस्य भी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नौले से ही जल लाते थे। घर पर रहने वाले मवेशियों के पीने के लिए और छोटी छोटी क्यारियों को सींचने के लिए नौले से ही जल लाया जाता था।नौले के माध्यम से आपस में मिलना जुलना हो जाता, सूचनाओं का आदानप्रदान हो जाता था। आपसी मेलजोल से सद्भावना सुदृढ़ होती थी।बीते कई वर्षों से मौसम परिवर्तन एवं बारिश के औसत दर में आई कमी के चलते भू गर्भीय जलस्तर में लगातार गिरावट आ रही है। नतीजा नौलों-धारों के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। रख-रखाव न होने से कई पानी के स्रोत खंडहर हो चुके हैं तो कई जगह पानी सूख गया है। परिणाम स्वरूप पर्वतीय क्षेत्रों में दिनों दिन पेयजल संकट भी बढ़ता जा रहा है।बीसवीं सदी से पहले पहाड़ के अधिकांश क्षेत्रों में परंपरागत धारे-नौलों का खास महत्व होता था। उस समय पेयजल योजनाएं भी नहीं थी। ग्रामीण लोग पेयजल के लिए नौलों व धारों पर ही निर्भर हुआ करते थे। जिनको सामाजिक एकता व सांस्कृतिक परिवेश का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता था। लेकिन कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन के बारिश के स्तर में आए बदलाव ने खासकर नौलों की दशा ही बदल दी है। पानी के कई स्रोत सूखने के साथ ही अधिकांश नौलों व धारों का तो वजूद ही समाप्त हो गया है। जरूरत के मुताबिक पानी जब घर पर ही उपलब्ध होने लगा तो नौलों की उपेक्षा होने लगी और हमारे पुरखों की धरोहर क्षीण-शीर्ण होकर विलुप्ति के कगार पर पहुँच गई । नौले नहीं, हमारे जीवन मूल्यों को पोषित करती संस्कृति ही खत्म हो जाएगी, यदि हम समय से न जागे।भूमिगत जल का निरन्तर ह्रास हो रहा है। जहाँ तालाब, पोखर, सिमार, गजार थे वहाँ कंक्रीट की अट्टालिकाएं खडी़ हो गईं। सीमेंट व डामर की सड़कें बन गईं।जंगल उजड़ गए। वर्षा जल को अवशोषित कर धरती के गर्भ में ले जाने वाली जमीन दिन पर दिन कम होने लगी है।समय के साथ जल की प्रति व्यक्ति खपत बढ़ती जा रही है। भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन का कृषि पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।आज आवश्यकता है लुप्तप्राय परंपरागत जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने की और उस तकनीक को विकसित करने की, जिसे हमारे पूर्वजों ने सदियों पहले अपना कर प्रकृति और संस्कृति को पोषित किया।उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के नौलों को चिन्हित कर पुनर्जीवित किया जाना आवश्यक है। गांवों में बन रही पेयजल योजनाओं ने नौलों के रखरखाव के प्रति लोगों का रूझान ही समाप्त कर दिया है। नतीजा गांवों में बने प्राचीन नौले व धारे अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में बदहाल पड़े हैं। गर्मी के सीजन में लोगों को इनकी याद जरूर आती है और वह इनसे ही अपनी प्यास बुझाते हैं। लेकिन इन धरोहरों को संरक्षित रखने की सुध कोई नहीं ले रहा है। कई ऐसे गांव हैं, जहां वर्तमान में भी कई नौले व धारे लोगों की प्यास शांत कर रहे हैं, लेकिन जाड़ों के समय पानी की जरूरत कम पडऩे पर लोग इनका उपयोग नहीं करते। उपयोग में न रहने के कारण इन स्रोतों के आस-पास झाड़ झंकार उग आता है। लोहाघाट का नर्सरी धारा, बाराकोट का जयंती धारा, पाटी का खेती धारा और चम्पावत का बरखा धारा आज भी सर्दी और गर्मी में लोगों की प्यास बुझा रहे हैं लेकिन अधिकांश धारों और नौलों का पानी सूख गया है, जिसका परिणाम पेयजल संकट के रूप में सामने आ रहा है।पर्यावरण व कंक्रीट का प्रयोग बढऩे से आबादी के क्षेत्रों में जमीन के अंदर बरसात का पानी कम जा रहा है। अधिकांश पानी सीधे बहकर नदी नालों में चला जाता है। यही कारण है कि भूजल के स्तर में गिरावट आ रही है। लोग घरों के पास कुए, हैंडपंप खोद रहे हैं। इससे भी जलस्तर लगातार घट रहा है। साल दो साल में कुए-हैंडपंप भी सूख जा रहे हैं। नौलों धारों का संरक्षण कर उनके आस-पास चौड़ी पत्ती वाले पौधों का रोपण किया जाना चाहिए। इस ओर ध्यान नहीं दिया तो आने वाली पीढ़ी को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय है.

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