संस्कृत भाषा के प्रचार, प्रसार, संरक्षण, संवर्धन एवं उन्नयन हेतु प्रतिवर्ष संस्कृत मास महोत्सव का आयोजन
उत्तराखंड संस्कृत संस्थान, हरिद्वार के द्वारा संस्कृत भाषा के प्रचार, प्रसार, संरक्षण, संवर्धन एवं उन्नयन हेतु प्रतिवर्ष संस्कृत मास महोत्सव का आयोजन किया जाता है, उसी क्रम में आज दिनांक 15 सितंबर 2026 मंगलवार को जनपद अल्मोड़ा के द्वारा संस्कृत साहित्य में शिल्प शास्त्र इस विषय पर संस्कृत संगोष्ठी का आयोजन किया। जिसमें कार्यक्रम की अध्यक्षता राजकीय महाविद्यालय, शीतलाखेत, अल्मोड़ा के प्राचार्य प्रो० ललन प्रसाद वर्मा ने करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में हमें शिल्प शास्त्र का वर्णन प्राप्त होता है जिसमें कि नाट्य मंडप का निर्माण कैसे किया जाए इस संदर्भ में भरत मुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र एक प्रामाणिक ग्रंथ है।
मुख्य अतिथि प्रो० लज्जा भट्ट संस्कृत विभागाध्यक्ष, कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल, ने अपने उद्बोधन में कहा कि पुराणों में भी हमें शिल्प शास्त्र का वर्णन प्राप्त होता है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण के चित्रसूत्र खंड को भारतीय कला इतिहास का सबसे प्रामाणिक स्रोत माना जाता है। इसके ‘चित्रसूत्र’ खंड में चित्रकला के अंग, रंगों के मिश्रण (वर्ण संस्कार), छह दोष और गुण, तथा मनुष्यों व देवताओं के अनुपात का अद्भुत वैज्ञानिक वर्णन है।
मुख्यवक्ता डॉ० ललित पांडेय, सहायकाचार्य, संस्कृत, किरोड़ीमल महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय,नई दिल्ली, ने अपने भाषण में कहा कि समरांगणसूत्रधार भारतीय शिल्प का अद्भुत ग्रंथ है जो कि भोजराज द्वारा विरचित है इसमें वास्तु शिल्प, मूर्ति कला, चित्रकला, धातु विज्ञान, वस्त्र कला, काष्ठ शिल्प यंत्र निर्माण का बहुत ही विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है और वाल्मीकि रामायण में नगर रचना, सेतु निर्माण पुष्पक विमान निर्माण आदि का वर्णन हमें प्राप्त होता है यदि हम महाभारत के संदर्भ में देखे तो उसमें हमें मयसभा लाक्षा ग्रह निर्माण का भी वर्णन प्राप्त होता है।
विशिष्ट अतिथि डॉ० दिनेश चंद्र पांडेय, संस्कृत विभागाध्यक्ष, पौड़ी परिसर, हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर, ने अपने उद्बोधन में कहा कि रामायण और महाभारत दोनों में ही देवशिल्पी भगवान् विश्वकर्मा का उल्लेख है। इन्होंने देवताओं के महलों, अस्त्र-शस्त्रों और नगरों का निर्माण किया। रामायण में लंका नगरी और महाभारत में द्वारका नगरी का निर्माण विश्वकर्मा द्वारा शिल्प शास्त्र के नियमों के अनुसार ही किया गया था।
सरस्वतातिथि डॉ० नवीन जसोला सहाचार्य, हिमालय आयुर्वेदिक महाविद्यालय, देहरादून अपने भाषण में कहा कि रामायण के बालकांड के पांचवें सर्ग में अयोध्या नगरी का जो वर्णन है, वह पूरी तरह शिल्प शास्त्र के मानकों के अनुरूप है। अयोध्या के राजमार्ग चौड़े थे, सड़कें नियमित रूप से साफ की जाती थीं, और पूरे नगर का विन्यास एक व्यवस्थित ग्रिड पैटर्न पर था।
कार्यक्रम के संचालक एवं जनपद संयोजक डॉ० प्रकाश चंद्र जांगी, सहायकाचार्य, राजकीय महाविद्यालय, शीतलाखेत, अल्मोड़ा ने कहा कि इस संगोष्ठी का उद्देश्य जन सामान्य को संस्कृत भाषा में स्थित ज्ञान विज्ञान से परिचित कराना है क्योंकि 15 सितंबर को राष्ट्रीय इंजीनियर दिवस मनाया जाता है। इसी उपलक्ष्य पर 15 सितंबर का दिवस संगोष्ठी हेतु चुना गया है। यह दिवस पर भारत रत्न डॉ० एम विश्वेश्वरैया को याद करने का दिवस है क्योंकि उन्होंने अपनी प्रतिभा, तकनीक, कौशल, राष्ट्र सेवा से देश को प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाने में अपना सहयोग प्रदान किया है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत साहित्य में स्थित शिल्पशास्त्र केवल भवन निर्माण की तकनीक नहीं, बल्कि कला, विज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिकता का एक अनुपम संगम है। संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों में शिल्पशास्त्र, वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला के माध्यम से वर्तमान परिदृश्य को जोड़ते हुए मानव जीवन को समृद्ध और संतुलित बनाने का एक मुख्य साधन माना गया है।
शिल्प शास्त्र के प्रमुख उदाहरणों में महाराष्ट्र में स्थित कैलाश मंदिर, 13वीं शताब्दी का कोणार्क का सूर्य मंदिर, बृहदेश्वर मंदिर तंजावुर शिल्प कला के अद्भुत नमूने हैं, और इसी के साथ-साथ तमिलनाडु में बना पंबन ब्रिज भी अपने आप में अद्भुत है।
भगवान विश्वकर्मा को ‘शिल्प शास्त्र’ वास्तुकला और इंजीनियरिंग का विज्ञान का रचयिता माना जाता है। उन्होंने ही निर्माण कला, मूर्तिकला और वास्तुकला के नियम तय किए थे। जो की संस्कृत साहित्य में स्थित शिल्प शास्त्र को विश्व पटल पर महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करते हैं।
कार्यक्रम के अंत में जनपद सहसंयोजक जगदीश चंद्र जोशी ने शांति मंत्र कर कार्यक्रम समापन की घोषणा की।
इस अवसर पर प्रो० ललन प्रसाद वर्मा प्रो० जया तिवारी, प्रो० शशि बाला वर्मा, डॉ० प्रकाश चन्द्र जांगी, डॉ० दीपिका आर्या, डॉ० छत्र सिंह कठायत, डॉ० वसुंधरा लस्पाल, डॉ० राजेंद्र चंद्र पांडे, डॉ लक्ष्मी मनराल, डॉ० हेमचंद्र तिवारी डॉ० अतुल कुमार मिश्र, डॉ० विवेक कुमार डॉ० अनीता नेगी, डॉ० आनंद जोशी डॉ० नवीन चंद्र पंत, डॉ नीरज कुमार जोशी डॉ चंद्र प्रकाश पांडे, डॉ० हेमचंद्र बेलवाल आदि उपस्थित रहे।


