15 सितम्बर को जनपद अल्मोड़ा के द्वारा संस्कृत साहित्य में शिल्प शास्त्र पर संस्कृत संगोष्ठी का किया जा रहा आयोजन
उत्तराखंड संस्कृत संस्थान, हरिद्वार के द्वारा संस्कृत भाषा के प्रचार, प्रसार, संरक्षण, संवर्धन एवं उन्नयन हेतु प्रतिवर्ष संस्कृत मास महोत्सव का आयोजन किया जाता है इसके उपलक्ष्य पर समस्त उत्तराखंड के 13 जनपदों में संस्कृत संगोष्ठी आयोजित की जाती है उसी क्रम में दिनांक 15 सितंबर 2026 मंगलवार को जनपद अल्मोड़ा के द्वारा संस्कृत साहित्य में शिल्प शास्त्र इस विषय पर संस्कृत संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है जिसमें कार्यक्रम की अध्यक्षता राजकीय महाविद्यालय, शीतलाखेत, अल्मोड़ा के प्राचार्य प्रो० ललन प्रसाद वर्मा मुख्य अतिथि प्रो० लज्जा भट्ट संस्कृत विभागाध्यक्ष, कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल, मुख्यवक्ता डॉ० ललित पांडेय, किरोड़ीमल महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय,नई दिल्ली, अतिविशिष्टातिथि डॉ० वेदव्रत, सहायकाचार्य, संस्कृत विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार, विशिष्ट अतिथि डॉ० दिनेश चंद्र पांडेय, संस्कृत विभागाध्यक्ष, पौड़ी परिसर, हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर, सरस्वतातिथि डॉ० नवीन जसोला सहाचार्य, हिमालय आयुर्वेदिक महाविद्यालय, देहरादून आदि उपस्थित रहेंगे।
कार्यक्रम के जनपद संयोजक डॉ० प्रकाश चंद्र जांगी, सहायकाचार्य, राजकीय महाविद्यालय, शीतलाखेत, अल्मोड़ा ने कहा कि इस संगोष्ठी का उद्देश्य जन सामान्य को संस्कृत भाषा में स्थित ज्ञान विज्ञान से परिचित कराना है क्योंकि 15 सितंबर को राष्ट्रीय इंजीनियर दिवस मनाया जाता है। इसी उपलक्ष्य पर 15 सितंबर का दिवस संगोष्ठी हेतु चुना गया है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत साहित्य में स्थित शिल्पशास्त्र केवल भवन निर्माण की तकनीक नहीं, बल्कि कला, विज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिकता का एक अनुपम संगम है। संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों में शिल्पशास्त्र, वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला के माध्यम से वर्तमान परिदृश्य को जोड़ते हुए मानव जीवन को समृद्ध और संतुलित बनाने का एक मुख्य साधन माना गया है।
शिल्प शास्त्र के प्रमुख उदाहरणों में महाराष्ट्र में स्थित कैलाश मंदिर, 13वीं शताब्दी का कोणार्क का सूर्य मंदिर, बृहदेश्वर मंदिर तंजावुर शिल्प कला के अद्भुत नमूने हैं, और इसी के साथ-साथ तमिलनाडु में बना पंबन ब्रिज भी अपने आप में अद्भुत है।
भगवान विश्वकर्मा को ‘शिल्प शास्त्र’ वास्तुकला और इंजीनियरिंग का विज्ञान का रचयिता माना जाता है। उन्होंने ही निर्माण कला, मूर्तिकला और वास्तुकला के नियम तय किए थे।
जो की संस्कृत साहित्य में स्थित शिल्प शास्त्र को विश्व पटल पर महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करते हैं।


