लोक संस्कृति संरक्षण की अनूठी पहल: भवाली विद्यालय में छात्राओं को सिखाई जा रही उत्तराखण्ड की लोक धुनें और पारम्परिक वाद्य यंत्र- रश्मि परिहार

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भवाली/नैनीताल।
उत्तराखण्ड की समृद्ध लोक संस्कृति और पारम्परिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के उद्देश्य से केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा शिक्षा विभाग और संस्कृति विभाग के माध्यम से विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, भवाली (नैनीताल) में एक सराहनीय पहल की गई है।
विद्यालय की सहायक अध्यापिका (संगीत) रश्मि परिहार छात्राओं को उत्तराखण्ड की लोक धुनों, लोक संगीत एवं पारम्परिक वाद्य यंत्रों से परिचित करा रही हैं। इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी में अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति प्रेम और जागरूकता विकसित करना है।
कार्यक्रम के दौरान छात्राओं को उत्तराखण्ड की प्रसिद्ध ‘जागर’ परम्परा के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। साथ ही राज्य की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले पारम्परिक वाद्य यंत्र हुड़का, ढोल और दमाऊ का परिचय कराया गया तथा इनके महत्व और उपयोग के बारे में भी बताया गया।
विद्यालय की इस पहल की अभिभावकों एवं स्थानीय लोगों ने सराहना करते हुए इसे उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।

जागर
जागर उत्तराखंडक कुमाऊँ और गढ़वाल में लगाई जाण वालि एक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक,पारंपरिक और संगीत पर आधारित हमार दयाप्तों और पितरौक पूज पाठेक रीत छू।

जागर किलै लगाई जैं-
जागरक माध्यमल उत्तराखंडक पहाड़ी लोग आपण कुलक दयाप्त, गौक दयाप्त, गोल गंगनाथ, ऐरी और पितरौक आत्माओं आराध्ना कर बेर उनूकै जगौनी, उनूकै बुलौनी।
जागर लगौन लिजी घरक सयाड मुखिया दूयी महत्वपूर्ण लोगों कै निमंत्रण दिबेर बुलौनी।
जगरी और डंगरी
जगरी एक पारंपरिक लोक गायक हूँ जो हुडका और ढोल दमाऊँक ताल पर देवी-देवताओंक स्तुति कर बेर पौराणिक गाथाओं कै गै-गै बेर उनुकै बुलौनी।
जगरिक संगीतल और मंत्रौक शक्तिल देवी दयाप्त और पितर डंगरिक शरीर में प्रवेश करनी। तब डंगरी कै भगवानक अवतार कयी जा। डंगरी लोगूक परेशानियोंक समस्याक समाधान बतूनी।
जागर उत्तराखंडेक लोगूक आस्था और संगीतक संगम छू।
जो लोगौंक (मनखी) और भगवानक बीचक सीध बात करणक रीति और माध्यम छू। जागर कुमाऊँ और गढवाल में पीढियों बै चली ऐरै परम्परा छू।
इकै अघिल पीढ़ी तक पहुँचुण भौत जरूरी छू। ताकि आजकलक नई पीढिक नान, नानतिन जागरक बार में जाण सको। उत्तराखंडेक संस्कृति और आस्था दगण जुडि रै सको।
रश्मि परिहार

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