दीपदान सहित इस प्रकार मनाएं जन्मदिन व्यक्ति होगा दीर्घायु एवं धन संपत्ति की होगी वर्षात

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दीपदान सहित इस प्रकार मनाएं जन्मदिन व्यक्ति होगा दीर्घायु एवं धन संपत्ति की होगी वर्षात ।,,,,,,,जन्मदिन अर्थात जिस दिन हमारा जन्म होता है उस दिन को हर व्यक्ति बेहतरीन बनाने का यथासंभव प्रयास करते हैं। जिसमें मार्कंडेय पूजा अष्ट चिरंजीवी की पूजा पंचतत्व पूजा गणेश पूजन आदि सभी विधि विधान से की जाती है। लेकिन यह बात शायद ही कम लोग जानते होंगे कि जन्मदिन वाले दिन यह छोटी सी पूजा को विधि विधान के अनुसार करें तो उनके जीवन में धन और वैभव की कभी कमी नहीं रहती। छप्पर फाड़ के धन मिलने के योग बन जाते हैं आज पाठकों को बताना चाहूंगा किस जन्मोत्सव को कौन सी और किस प्रकार की पूजा करें जो आपके जीवन में अपार खुशियों की सौगात लेकर आ सकता है। हमारे सनातन धर्म में शास्त्रों एवं ज्योतिष शास्त्र में जन्मदिन मनाने का बहुत ही महत्वपूर्ण एवं पूजा पाठ का विधान बताया गया है इस प्रकार की पूजा से जीवन में चारों तरफ से शुभ ही शुभ होने लगता है। अनेकों देवी-देवताओं का आशीर्वाद भी मिलता है सर्वप्रथम तो आप यह जन्म उत्सव अंग्रेजी तारीख से ना मनाते हुए हिंदू पंचांग की चंद्र मास की तिथि के अनुसार मनाएं। उदाहरणार्थ माना किसी जातक का जन्म पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी के दिन हुआ हो तो प्रत्येक वर्ष उसका जन्मोत्सव सफला एकादशी के दिन ही मनाना चाहिए। इस शुभ अवसर पर अष्ट चिरंजीवी की पूजा करते हैं तो निश्चित रूप से हमें दीर्घायु तथा सुखी जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है। और इनकी कृपा से अथाह धन की प्राप्ति भी होती है। जन्मोत्सव के दिन अष्ट चिरंजीवी अर्थात अश्वत्थामा राजा बलि व्यास जी महाराज पवन पुत्र हनुमान जी विभीषण कृपाचार्य परशुराम जी और आठवें मार्कंडेय ऋषि की पूजा विधि विधान से करनी चाहिए। अष्टचिरंजीवीयों का पूजन प्रातः षोडशोपचार विधि से ही करना चाहिए। ऐसा करने से जातक को इन अष्ट चिरंजीवीयों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। अर्थात धन की प्राप्ति होती है घर परिवार में खुशियों के साथ धन-संपत्ति में बरकत होती है। और जीवन में आने वाली विपरीत घटनाओं से हमारी रक्षा होती है। हमें भी दीर्घायु जीवन प्राप्त होता है इनका पूजन करने से जीवन में आने वाले समस्त दुख स्वत:ही नष्ट हो जाते हैं। यदि छोटे बच्चों के जन्मोत्सव पर इनका पूजन किया जाए तो उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। अष्ट चिरंजीवी पूजा के बाद पंचतत्व पूजन के लिए चावल की पांच छोटी-छोटी ढेर पूजन वेदी पर बनानी चाहिए पांच तत्वों के लिए पांच रंग से चावल भी रंग कर अलग-अलग पुडिया में रख दें यह रंगीन ढेर लगाने से वेदी आकृष्ट और अच्छी बन जाती है। पंच तत्वों के कर्म रंग इस प्रकार हैं एक पृथ्वी हरा दो वरुण काला तीन अग्नि लाल चारवायु पी ला और पांच आकाश सफेद। इसी क्रम में ढेरिया लगाकर रखनी चाहिए। और मंत्रोच्चारण द्वारा उनकी पूजा करनी चाहिए। पंचतत्व पूजा के बाद फिर दीपदान का आयोजन किया जाता है। जन्मोत्सव के लिए उतने ही दीपक रखें जितने जातक की जन्मोत्सव का वर्ष है अर्थात जातक ने जितने वर्ष पूरे किए हो इतने छोटे-छोटे दीपक तथा नए वर्ष वाला बड़ा दीपक बनाया जाता है दीपक आटे के भी बनाए जा सकते हैं और मिट्टी के भी रखे जा सकते हैं। अभाव में मोमबत्ती के टुकड़े भी प्रयुक्त किए जा सकते हैं। उन्हें एक तांबे अथवा पीतल की परात में सुंदर आकृति में सजाकर रखना चाहिए। पंचतत्व पूजन के लाभ।, ,,,,, शिक्षण एवं प्रेरणा शरीर पंचतत्व से बना है इस संसार का प्रत्येक पदार्थ मिट्टी जल अग्नि वायु आकाश इन पांच तत्वों से बना है। इसलिए इस सृष्टि के आधारभूत यह पांच ही दिव्य तत्व देवता हैं। हम जड़ और चेतन सभी उपकारियों के प्रति कृतज्ञता भावना की अभिव्यक्ति के लिए पूजा प्रक्रिया करते हैं। पूजा से इन जड़ पदार्थों अदृश्य शक्तियों का भले ही कोई लाभ न हो पर हमारी कृतज्ञता का प्रस्तुत भाव जागृत होने से हमारी आंतरिक उत्कृष्टता बढ़ती है। पंच तत्वों का पूजन विश्व के आधार स्तंभ होने की महत्ता के निमित्त किया जाता है। इस पूजन का दूसरा उद्देश्य यह है कि इन पांचों के सदुपयोग का ध्यान रखा जाए। शरीर जिन तत्वों से बना है उनका यह भी सही रीति नीति से उपयोग करते रहा जाए तो कभी अस्वस्थ होने का अवसर ना आए। पृथ्वी से उत्पन्न अन्न का कितना और कब कैसे उपयोग किया जाए इसका ध्यान रखें यदि आहार की सात्विकता मात्रा एवं व्यवस्था का ध्यान रखा जाए तो अपच नहीं होगा किसी रोग की संभावना नहीं रहेगी। जल की स्वच्छता एवं उचित मात्रा में सेवन करने का विधिवत स्नान का वस्त्र बर्तन घर की सफाई में जल के उचित प्रयोग का ध्यान रखा जाए तो समग्र स्वच्छता बनी रहे। अग्नि की उपयोगिता सूर्यताप को शरीर वस्त्र घर आदि में पूरी तरह प्रयोग करने में है। भोजन में अग्नि का सदुपयोग भाप द्वारा पकाए जाने में है। वायु को दूषित न होने देना आदि वायु की प्रतिष्ठा है। आकाश हमारी अंतः चेतना उत्कृष्ट स्तर की ओर चले यह जानना समझना आकाश तत्व का उपयोग है। इसी सदुपयोग के द्वारा हम सुख शांति और समृद्धि का पथ प्रशस्त कर सकते हैं। पंच तत्वों का पूजन हमारा ध्यान इनके सदुपयोग की ओर आकर्षित करता है। पंच तत्वों का आवाहन मंत्र से पूजा करें। ओम पृथिविये नम: आवाहयामि स्थापयामि पूज्यामि,। ओम वरुणाये नमः आवाहयामि स्थापयामि पूज्यामि। ओम अग्ने नमः आवाहयामि स्थापयामि पूज्यामि । ओम वायव्य नमः आवाहयामि स्थापयामि पूज्यामि । ओम आकाशाय नम: आवाहयामि स्थापयामि पूज्यामि इन मंत्रों से पंचतत्व पूजा करनी चाहिए। तदुपरांत यज्ञ आदि कर्म पूर्ण करने के बाद गायत्री मंत्र की आहुति के बाद महामृत्युंजय मंत्र की आहुति दी जाए यदि केवल दीप यज्ञ किया गया हो तो सभी लोग 5 बार महामृत्युंजय मंत्र का एक स्वर में पाठ करें। तदुपरांत जातक अपने बड़ों का आशीर्वाद लें माता-पिता उसे दूध और तिल के लड्डू खिलाए। तदुपरांत जातक की कुंडली में रक्षा धागे से प्रतिवर्ष की तरह एक गांठ लगाएं। इस बात का ध्यान दें मोमबत्ती बुझा ना अथवा केक काटना हिंदू परंपरा के विपरीत है। इससे नकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। दीपदान करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। दीप बुझाना हिंदू परंपरा के अनुसार बहुत बड़ा अपशकुन माना जाता है। इसलिए सभी हिंदू भाई बहनों से एक बार पुनः विनम्र निवेदन है कि आप लोग पाश्चात्य परंपरा को त्याग कर अपनी सनातन परंपरा को बढ़ावा दें। जहां तक संभव हो सके हिंदू परंपरा ही अपनाने का प्रयास करें। और बड़े भाग्यशाली हैं वह लोग जिनका जन्म पौष कृष्ण पक्ष एकादशी अर्थात सफला एकादशी के दिन हुआ हो। ऐसे जातक हर कार्य में हर क्षेत्र में चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो या कोई अन्य सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करते हैं और अपने कार्य में सफल रहते हैं। लेखक श्री पंडित प्रकाश जोशी


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