हिमालयी पर्यावरण एवं चुनौतियां विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबीनार का किया आयोजन

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कुमाऊँ विश्वविद्यालय नैनीताल वनस्पति विज्ञान विभाग के पूर्व प्रोफेसर तथा हिमालयी वर्गीकरण शास्त्री स्व0 डा0 यशपाल सिंह पांगती को उनकी तृतीय पूण्य तिथि पर डॉ. वाई.पी.एस.पांगती रिसर्च फाउण्डेशन सोसायटी द्वारा श्रृद्धांजली दी गयी तथा हिमालयी पर्यावरण एवं चुनौतियां विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबीनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. एन.के. जोशी कुलपति कुमाऊँ विश्वविद्यालय नैनीताल ने कहा कि प्रो. वाई.पी. पांगती एक समर्पित प्राध्यापक तथा शोधार्थी रहे, साथ ही कहा कि हिमालय विश्व की जैव विविधता हॉट स्पॉट है तथा यहा कि 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी औषधीय पौधो पर अपनी आजिविका के लिए निर्भर है। हिमालय की जैव विविधता विशिष्ट है तथा पलायन के दौर में से औषधिय पौधे रोजगार के अवसर में वृद्धि कर सकते हैं। प्रो0जोशी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन एक बडी चुनौती है तथा जैव विविधता के संरक्षण से ही हम इस पर नियंत्रण पा सकते हैं तथा हमें अधिक ऑक्सीजन उत्सर्जन वाले पौधे लगाने चाहिए। डॉ. वाई.पी.एस.पांगती रिसर्च फाउण्डेशन सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. बी.एस. कालाकोटी ने सभी अतिथियों तथा प्रतिभागियों का स्वागत एवं अभिनन्दन किया तथा संस्था के महासचिव प्रो0ललित तिवारी ने कार्यक्रम का संचालन करते हुएं स्व प्रो0 पांगती के जीवन वृत्य तथा पादप जगत में उनके द्वारा किये गए योगदान पर प्रकाश डाला। प्रो0पांगती का जन्म 7 जुलाई 1944 को हुआ था तथा 28 अगस्त 2018 को उनका निधन हुआ था, वह पीएचडी, डी.लिट ,यू.जी.सी एमरिटस फैलो तथा नैशनल एकेडेमिक ऑफ सांइस रहे। उनके 150 शेध पत्र, 12 पुस्तक लिखी तथा 40 शोधार्थियों ने उनके कुशल निर्देशन में शोध कार्य किया। वन्य जीव संस्थान देहरादून के पूर्व निदेशक प्रो.जी.एस. रावत ने कहा कि संस्था युवाओं को पर्यावरण के प्रति सचेत तथा शोध हेतु आगे लाने का प्रयास करेगी मुख्य वक्ता सी.एस.आई.आर.ए.आई.एच.वी.टी. के निदेशक डॉ.संजय कुमार ने कहा कि हमे जैविक संसाधन का उपयोग करना चाहिए तथा हिमालय क्षेत्र में होने वाले औषधिय पौधो के मूल्य वर्धन से रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध हो सकते हैं। उन्होने बताया कि बहुत सी औषधिय मधुमेह के नियंत्रित करने तथा रोगप्रतिरोधक क्षमता बढाने मे सहायक है । उन्होने जंगली फलों को घरेलू उपयोग पर जोर दिया। दूसरे मुख्य वक्ता आई. सी.एफ.आर.ई.वुड सांइस संस्थान बैगलरू के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के.के.पाण्डे ने कहा कि अच्छी काष्ट(वुड)उसके अच्छे गुणों के आधार पर तथा सतत विकास के क्रम में मजबूती प्रदान करता है। उन्होने कहा कि तकनीकि के युग में काष्ट को और महत्वपूर्ण और मजबूत किया जा सकता है । काष्ट रसायन के साथ-साथ नार्वे में 80 मीटर ऊँची ईमारत काष्ट द्वारा निर्मित की गयी है जो उसकी मजबूती को दर्शाता है । उन्होने काष्ट के विभिन्न गुणों पर व्यापक प्रकाश डाला। एच.आर.डी.आई.गोपेश्वर के पूर्व निदेशक डॉ. एन.सी. साह ने बताया कि हमें उच्च स्थलीय पौधो का संरक्षण करना चाहिए तथा अत्याधिक दोहन पर रोक लगानी चाहिए। उन्होने कहा कि हिमालय के उच्च क्षेत्र में औषधिय पौधों के भण्डार है। एच.एफ.आर.आई.शिमला के निदेशक डॉ. एस.एस. सांमत ने कहा कि समुदाय की संरचना ऊँचाई के साथ बदलती है तथा पादप प्रजाति का कम होना चिंताजनक है जिससे जलवायु परिवर्तन की समस्या और गंभीर हो रही है। राष्ट्रीय वेबिनार में लिए गए निर्णय पर प्रकाश डालते हुए प्रो. जी. एस.रावत ने कहा हमें हिमालय के सभी भागों को सुरक्षित करना होगा तथा युवा वैज्ञानिकें को इस कार्य के लिए आगे आना होगा जिससे हिमालय जैव विविधता संरक्षित की जा सके तथा सतत विकास के क्रम में हम अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकें। कार्यक्रम के अन्त में डॉ.नीलू लोधियाल ने संस्था की तरफ से सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया। राष्ट्रीय वेबिनार के अन्त में प्रोफेसर पांगती को श्रृद्धाजंली अर्पित करते हुए दो मिनट का मौन रखा। वेबिनार में 143 प्रतिभागियों द्वारा पंजीकरण करवाया गया तथा कार्यक्रम को यूटयूब तथा फेसबुक के माध्यम से भी प्रस्तुत किया गया।

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