सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने का पर्व है सातों- आठों

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सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने का पर्व है सातों- आठों
डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
विहंगम हिमालयी भू-भाग को शिव की भूमि माना जाता है। अलग-अलग स्थानों में शिव के कई रुपों में पूजा होती है। शिव की अर्धांगिनी पार्वती हैं। शिव और शक्ति के प्रतीक शिवलिंग का यही अर्थ है। शिव पुरुष के प्रतीक और शक्‍ति स्‍वरुपा पार्वती प्रकृति की। पुरुष और प्रकृति के बीच यदि संतुलन न हो, तो सृष्टि का कोई भी कार्य भली-भांति संपन्न नहीं हो सकता है। संसार के इसी संतुलन को बनाए रखने का पर्व है सातों-आठों। जो उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। खासकर कुमाऊं के पूर्वोत्तर भू-भाग में। उत्सव महाकाली नदी के दोनों ओर,कुमाऊँ और पश्चिमी नेपाल में, मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण लोक उत्सव है। गमरा में प्रकॄति और मनुष्य के गहरे व आत्मीय रिश्तों की अभिव्यक्ति होती है। स्त्री केन्द्रित इस उत्सव में समूचा समाज गतिशील होकर एकता की अद्भुद बानगी पेश करता है। यह केवल उल्लास और आनंद की अभिव्यक्ति ही नही वरन् लोकजीवन के उद्भव, विकास और मानवीय संवेदनाओं का आख्यान भी है।यह लोक उत्सव वर्षाकाल में मनाया जाता है। यह एक ऐसी ऋतु है जो अपने साथ मानव जीवन और खास कर खेतिहर समाजों के लिए नई उमंग ले कर आती है। गर्मी से झुलसाई धरती में वर्षा की फुहारों के आगमन के साथ नये जीवन का संचार होने लगता है। खेतिहर समाजों के जीवन में जहाँ यह समय कठोर श्रम और व्यस्थता ले कर आता है वहीं यह उनकी जिजीविषा, सुख-दुख, हर्ष-उल्लास और उमंग की अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनता है। लोक जीवन में प्रकॄति के रहस्यों से उपजे कौतूहल के साथ-साथ इस उत्सव की उमंग में श्रम से उपजी कलात्मकता और श्रम की कला के रोचक बिम्ब देखने को मिलते हैं। गौरा-महेश की पूजा का लोक पर्व सातूं -आठू करीब है। भाद्रपद यानी भादो मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी व अष्टमी को इसे मनाया जाता है। इस बार 29 अगस्त को सातूं व 30 अगस्त को आठू पर्व मनाया जाएगा। कहा जाता है कि सप्तमी को मां गौरा ससुराल से रूठकर अपने मायके आ जाती हैं, उन्हें लेने के लिए अष्टमी को भगवान महेश यानी शिव आते हैं।सातूं-आठू में सप्तमी के दिन मां गौरा व अष्टमी को भगवान शिव की मूर्ति बनाई जाती है। मूर्ति बनाने के लिए मक्का, तिल, बाजार आदि के पौधे का प्रयोग होता है। जिन्हें सुंदर वस्त्र पहनाए जाते हैं। विधि अनुसार पूजन किया जाता है। झोड़ा-चाचरी गाते हुए गौरा-महेश के प्रतीकों को खूब नचाया जाता है। महिलाएं दोनों दिन उपवास रखती हैं। अष्टमी की सुबह गौरा-महेश को बिरुड़ चढ़ाए जाते हैं। प्रसाद स्वरूप इसे सभी में बांटा जाता है और गीत गाते हुए मां गौरा को ससुराल के लिए बिना किया जाता है। मूर्तियों को स्थानीय मंदिर या नौले (प्राकृतिक जल स्रोत) के पास विसर्जित किया जाता है। कुछ जगहों पर दो से तीन दिन बाद भी इसे विसर्जित किया जाता है। लोक पर्व सातूं-आठू की शुरुआत दो दिन पहले हो जाती है। भौदो मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को बिरुड़ पंचमी कहा जाता है। इस दिन घरों में तांबे के बर्तन में पांच या सात अनाजों को पानी में भिगो दिया जाता है। इसमें दाडि़म, हल्दी, सरसों, दूर्बा के साथ एक सिक्के की पोटली रखी जाती है। संस्कृतज्ञ खीम कहते हैं कि सातूं-आठू का पर्व वैज्ञानिक महत्व भी रखता है। सातूं-आठू में अंकुरित अनाजों को प्रसाद स्वरूप खाया जाता है। सातूं के दिन महिलाएं बांह में डोर धारण करती हैं। जबकि आठू के दिन गले में दुबड़ा (लाल धागा) धारण करती हैं। इस पर्व को लेकर पौराणिक कथा प्रचलित है। बिरूड़ाष्टमी के दिन महिलाएं गले में दुबड़ा (लाल धागा) धारण करती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार पुरातन काल में एक ब्राहमण था जिसका नाम बिणभाट था। उसके सात पुत्र व सात बहुएं भी थीं लेकिन इनमें से सारी बहुएं निसंतान थी। इस कारण वह बहुत दुखी था। एक बार वह भाद्रपद सप्तमी को अपने यजमानों के यहां से आ रहा था। रास्ते में एक नदी पड़ती थी। नदी पार करते हुए उसकी नजर नदी में बहते हुए दाल के छिलकों पर पड़ी। उसने ऊपर से आने वाले पानी की ओर देखा तब उसकी नजर एक महिला पर पड़ी जो नदी के किनारे कुछ धो रही थी। वह उस स्त्री के पास जाकर देखा तो वह स्त्री कोई और नहीं बल्कि खुद देवी पार्वती थी, और कुछ दालों के दानों को धो रही थीं। बिणभाट ने बड़ी सहजता से इसका कारण पूछा तब उन्होंने बताया कि वह अगले दिन आ रही बिरूड़ाष्टमी पूजा के विरूड़ों को धो रही हैं। बहु ने ससुर के कहे अनुसार अगले दिन व्रत रखकर दीपक जलाया और पंच्च अनाजों को एकत्र कर उन्हें एक पात्र में डाला। जब वह उन्हें भिगो रही थी तो उसने एक चने का दाना मुंह में डाल लिया जिससे उसका व्रत भंग हो गया। इसी प्रकार छहों बहुओं का व्रत भी किसी न किसी कारण भंग हो गया। सातवीं वहु सीधी थी। उसे गाय-भैंसों को चराने के काम में लगाया था। उसे जंगल से बुलाकर बिरूड़ भिगोने को कहा गया। उसने दीपक जला विरूड़ भिगोये। तीसरे दिन उसने विधि विधान के साथ सप्तमी को उन्हें अच्छी तरह से धोया। अष्टमी के दिन व्रत रखकर शाम को उनसे गौरा-महेश्वर की पूजा की। दूब की गांठों को डोरी में बांध दुबड़ा पहना और बिरूड़ों का प्रसाद ग्रहण किया। मां पार्वती के आशीर्वाद से दसवें माह उसकी कोख से पुत्र ने जन्म लिया। कुमाऊं के अधिकांश गांवों में सातूं-आठूं की तैयारियां शुरू हो गई हैं। गमरा कुमाऊँ और पश्चिमी नेपाल की सदियों से चली आ रही साझी संस्कृति का जीवंत प्रमाण है, यह पित्रसत्तात्मक समाज में स्त्री की गैर-बराबरी और अपने जीवन के बारे में फैसला न लेने सकने के अधिकार की कहानी भी है।ये उत्सव बताते हैं की संघर्ष भरे जीवन में यहाँ के समाज ने जहाँ एक ओर प्रकॄति के रहस्यों से अचंभित हो अदॄश्य शक्तियों की पूजा अर्चना की, वहीं कर्मकांडों की आड़ में अंततः उन रूढ़ियों को भी बनाए रखा जो गैर बराबरी वाले सामंती उत्पादन संबंधों को बनाए रखना चाहती थी। यही नहीं शायद उत्सवों के पौराणिक रहस्यवाद ने एक इंसान के रूप में महिलाओं को दोयम समझने व पुरुष आश्रित बनाए रखने में भी बड़ी भूमिका निभाई है।हमारी जम्मेदारी है कि उसे अगली पीढ़ी को देते जाए. नहीं तो बुढ़ तो एक दिन जाएंगे ही, मगर भाग सरा नहीं पायेंगे. इस क्रम के टूटने का डर बना रहता है क्योंकि चक्र टूटने का मतलब सभ्यता, संस्कृति और परम्पराओ की विलुप्ति. कुमाऊँ में भी अब सांस्कृतिक विरारत व्यावसायिक लोगों के भरोसे जीवित है. आज हमें हर गाव में एक पुरूषार्थी आमा की आवश्यकता है जो जीवनमूल्यों, परम्पराओं की सांस्कृतिक धरोहर संजो कर रख सके.
लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय है.

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