अनवष्टका श्राद्ध या नवमी श्राद्ध का विशेष महत्व

ख़बर शेयर करें

अनवष्टका श्राद्ध या नवमी श्राद्ध,,,,,, इस बार महालय पक्ष में अनु अष्टका श्राद्ध या नवमी श्राद्ध दिनांक 30 सितंबर 2021 को है। पुराणों में श्राद्ध के बारे में अनेक बातें लिखी गई हैं। मार्कंडेय पुराण के अनुसार श्राद्ध से तृप्त होकर पित्र गण श्राद्ध कृता को दीर्घायु संतति धन विद्या सुख राज्य आदि प्रदान करते हैं। इसी तरह कर्म पुराण में कहा गया है कि जो प्राणी जिस किसी भी विधि से एकाग्र चित्त होकर श्राद्ध करता है। वह समस्त पापों से रहित होकर मुक्त हो जाता है और पुनः संसार चक्र में नहीं आता है। बंधु बांधवों के साथ अन्न जल से किए गए श्राद्ध की तो बात ही क्या है। केवल श्रद्धा प्रेम से शाक के द्वारा किए गए श्राद्ध से ही पितर तृप्त होते हैं। इसी प्रकार ब्रह्म पुराण में वर्णन है कि श्रद्धा एवं विश्वास पूर्वक किए हुए श्राद्ध में पिंड ऊपर गिरी हुई पानी की नन्हीं नन्हीं बूंदों से पशु पक्षियों की योनि में पड़े हुए पितरों का पोषण होता है। जिस कुल में जो बाल्यावस्था में ही मर गए हो वह सम्मार्जन के जल से तृप्त हो जाते हैं। महर्षि सुमंतु के अनुसार श्राद्ध का महत्व तो यहां तक है कि श्राद्ध में भोजन करने के बाद जो आच पन किया जाता है उससे भी पित्र गण संतुष्ट हो जाते हैं। महर्षि सुमन्तु ने श्राद्ध से होने वाले लाभ के बारे में बताया है कि संसार में श्राद्ध से बढ़कर कोई कल्याणप्रद मार्ग नहीं है। अतः बुद्धिमान मनुष्य को प्रयत्न पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है। वायु पुराण मत्स्य पुराण गरुड़ पुराण विष्णु पुराण तथा अन्य शास्त्रों में भी श्राद्ध कर्म के महत्व के बारे में बताया गया है। माता- पितामही चैव तथैवप्रपितामही ।पिता – पितामहश्चैव तथैव प्रपितामह:।।माता महस्तत्पिता च प्रमातामहकादय:। ऐतेबॉर भवन्तु सुप्रीता: प्रयच्छंतु च मंगलम ।। पित्र हमारे वंश को बढ़ाते हैं। पित्र पूजन करने से परिवार में सुख शांति धनधान्य यश वैभव लक्ष्मी हमेशा बनी रहती है। संतान का सुख भी पित्र ही प्रदान करते हैं। शास्त्रों में पित्र को पित्र देव कहा जाता है। पित्र पूजन प्रत्येक घर के शुभ कार्य में भी प्रथम किया जाता है। जोकि नांदी श्राद्ध के रूप में किया जाता है। एक महत्वपूर्ण बात पाठकों को और बताना चाहूंगा की तेतरीय संहिता के अनुसार पूर्वजों की पूजा अथवा श्राद्ध हमेशा दाएं कंधे में जनेऊ डालकर और दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके ही करनी चाहिए। माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत में दिशाएं देवताओं मनुष्यों और रूद्र में बंट गई थी इसमें दक्षिण दिशा पितरों के हिस्से में आई थी। एक महत्वपूर्ण बात और श्राद्ध में सात पदार्थ गंगाजल दूध शहद तरस का कपड़ा दौहित्र कुशा और तिल सर्वाधिक महत्वपूर्ण है तुलसी से तो पित्र पलाई काल तक प्रसन्न और संतुष्ट रहते हैं। इस पित्र पक्ष की एक और पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि जब महाभारत के युद्ध में करण का निधन हो गया था और उसकी आत्मा स्वर्ग पहुंच गई तो उन्हें रोजाना खाने के बजाय खाने के लिए सोना और गहने दिए जाते थे। इस बात से निराश होकर 1 दिन कर्ण की आत्मा ने इंद्रदेव से इसका कारण पूछा कि यहां मेरे साथ यह अन्याय यह दुर्व्यवहार क्यों हो रहा है। तब इंद्र ने कर्ण को बताया कि आपने अपने पूरे जीवन में सोने के आभूषणों को दूसरों को दान किया लेकिन कभी भी अपने पूर्वजों को भोजन नहीं दिया। तब करण ने उत्तर दिया कि मैं अपने पूर्वजों के बारे में जानता ही नहीं हूं। कर्ण का उत्तर सुनने के बाद भगवान इंद्र ने उसे 16 दिनों की अवधि के लिए पृथ्वी पर वापस जाने की अनुमति दी ताकि वह अपने पूर्वजों को भोजन दान कर सके तब से इन 16 दिनों की अवधि को 16 श्राद्ध के रूप में जाना जाता है। लेखक श्री पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल,

Ad

लेटेस्ट न्यूज़ अपडेट पाने के लिए -

👉 वॉट्स्ऐप पर समाचार ग्रुप से जुड़ें

👉 फ़ेसबुक पर जुड़ने हेतु पेज लाइक-फॉलो करें

👉 हमारे मोबाइल न० 9410965622 को अपने ग्रुप में जोड़ कर आप भी पा सकते है ताज़ा खबरों का लाभ

👉 विज्ञापन लगवाने के लिए संपर्क करें

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You cannot copy content of this page