काशी के कोतवाल एवं भगवान शिव जी के पांचवे अवतार माने जाते हैं भगवान काल भैरव

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काशी के कोतवाल एवं भगवान शिव जी के पांचवे अवतार माने जाते हैं भगवान काल भैरव।,,,,,,,,,, मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को काल भैरव अष्टमी या काल भैरव जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस बार सन् 2021 में दिनांक 27 नवंबर दिन शनिवार को काल भैरव अष्टमी है। अष्टमी तिथि का प्रारंभ दिनांक 27 नवंबर प्रातः 5:44 से तथा समापन दिनांक 28 नवंबर दिन रविवार प्रातः 6:00 बजे तक है। अतः 27 नवंबर को काल भैरव अष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन मघा नामक नक्षत्र छत्तीस घड़ी 44 पल तक है तदुपरांत पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र उदय होगा। इस दिन ऐन्द्र नामक योग है। तथा बालव नामक करण 27 घड़ी 37 पल तक है। यदि चंद्रमा की स्थिति जाने तो इस दिन चंद्रमा की स्थिति पूर्णरूपेण सिंह राशि में है। पुराणों के अनुसार इस दिन भगवान काल भैरव का अवतरण हुआ था। मान्यता है कि अपने भक्तों के लिए जहां भगवान काल भैरव दयालु भक्तों का कल्याण कारी एवं मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले और अति शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं वहीं दूसरी ओर जो व्यक्ति अनैतिक कार्य कर रहे हो अत्याचारी एवं पाप कर्म करने वालों की तो खैर नहीं। वह ऐसे व्यक्तियों को कठोर से कठोर दंड देते हैं। मात्र इतना ही नहीं अगर उनके भक्तों का कोई अहित करने की सोच भी ले तो उसे तीनों लोकों में कहीं भी शरण नहीं मिलती। पुराणों के अनुसार ऐसी मान्यता है कि भगवान काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन यदि पुराणों पर आधारित कुछ महत्वपूर्ण उपायों को कर लिया जाए तो आपको जीवन में कई प्रकार की विघ्न बाधाओं एवं परेशानियों से हमेशा के लिए मुक्ति मिल सकती है। और सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। आज मैं अपने सुधी पाठकों के कल्याण हेतु कुछ महत्वपूर्ण उपायों की जानकारी अपने आलेख के माध्यम से देना चाहूंगा। और अपने सुधि पाठकों से विनम्र निवेदन भी करना चाहूंगा कि आप भली-भांति आलेख में लिखी जानकारियों को पढ़ें। ताकि इन महत्वपूर्ण उपायों में कोई चूक न हो। यह उपाय निम्न प्रकार से है। भगवान काल भैरव भगवान शिव के स्वरूप हैं अतः इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से भगवान काल भैरव की कृपा एवं उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है प्राप्त होता है। अतः इस दिन किसी शिवालय में जाकर अथवा नजदीक के किसी शिव मंदिर में जाकर 21 बेलपत्र जो कि साबुत हूं पूर्ण रूप से तीन दलों में हूं खंडित या छेद वाले ना हो उन पर चंदन से ओम नमः शिवाय लिखकर शिवलिंग पर अर्पित करें। चंदन शुद्ध होना चाहिए कई भक्त कुमकुम को भी चंदन मानते हैं। चंदन से मेरा तात्पर्य चंदन की लकड़ी को जल डालकर घिसकर लेप तैयार करने से है। इसके उपरांत अपनी मनोकामनाएं जो भी हैं सिर्फ मन में सोचें बोले नहीं ऐसा करने से आपकी मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती है। तदुपरांत काल भैरव चालीसा का पाठ करें। या इससे भी महत्वपूर्ण काल भैरव जयंती के दिन ऐसे मंदिर में जाकर पूजन करें जहां लोग कम जाते हो। या कई दिनों से वहां किसी ने पूजा न की हो। ऐसा माना जाता है कि जो भैरव कम पूजे जाते हैं उनका पूजन करने से भगवान काल भैरव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। काल भैरव जयंती के दिन मंदिर में दीपक प्रज्वलित करें और भगवान भैरव को पान सुपारी नारियल मिश्री या शुद्ध प्रकार से बनी जलेबी का भोग लगाएं। भगवान भैरव का वाहन श्र्वान अर्थात कुत्ता माना गया है। इस दिन भगवान भैरव की पूजा के साथ साथ कुत्ते को भोजन अवश्य करवाना चाहिए। मुख्य रूप से काले कुत्ते को भोजन कराएं। इससे आपको शनिदेव की कृपा भी प्राप्त होगी। ऐसा करने से आपके जीवन की सभी विघ्न बाधाएं समाप्त हो जाएंगी। काल भैरव पूजा करने से साधक को भय से भी मुक्ति प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त ग्रह बाधा एवं शत्रु बाधा से भी मुक्ति मिलती है। काल भैरव पूजन के बाद आरती को करें तत्पश्चात जाने अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगे। पुराणों में काल भैरव जी के जन्म की बहुत ही रोचक कथा है। इसके अनुसार एक बार ब्रह्मा जी एवं विष्णु जी में इस बात पर वाद विवाद छिड़ गया कि कौन सर्वश्रेष्ठ है? विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों आपस में युद्ध करने लगे कि कौन श्रेष्ठ है? तदुपरांत सभी देवताओं ने वेदों से पूछा तो वेदों का उत्तर था कि जिस के भीतर चराचर जगत भूत भविष्य एवं वर्तमान समाया हुआ है वहीं सर्वश्रेष्ठ है। वेदों के मुख से यह बात सुन कर ब्रह्मा जी क्रोधित हुए उन्होंने अपने पांचवें मुख से भगवान भोले शंकर के बारे में बहुत भला बुरा कहा। जिसे सुनकर वेद बहुत दुखी हुए। इसी समय एक दिव्य ज्योति के रूप में भगवान रुद्र प्रकट हुए। तब ब्रह्मा ने कहा कि हे रूद्र तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो। अत्यधिक रोने के कारण मैंने तुम्हारा नाम रुद्र रखा है। इसलिए तुम मेरी सेवा में आ जाओ। ब्रह्मा जी के इस आचरण पर शिव जी को क्रोध आ गया। और उन्होंने भैरव को उत्पन्न कर कहा तुम ब्रह्मा पर शासन करो। दिव्य शक्ति संपन्न काल भैरव ने अपनी वाम हस्त की कनिष्ठा से अर्थात बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से शिवजी के प्रति अपमानजनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा के पांचवें सिर को ही काट दिया। तदुपरांत शिव जी के कहने पर भगवान भैरव जी काशी में प्रवेश किए। जहां ब्रह्महत्या से उन्हें मुक्ति मिली। रूद्र ने उन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया। आज भी यह काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि काशी में विश्वनाथ के दर्शन काशी के कोतवाल के बिना अधूरे हैं।।सिद्धि मंत्र- ओम् हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:। काल भैरव की आराधना के लिए।। ओम भैरवाय नमः।। तथा दूसरे रूप बटुक भैरव के लिए- बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन्:। ब्रह्मा विष्णु महेशाधैवर्न्दित दयानिधि।। अर्थात ब्रह्मा विष्णु महेश आदि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है । काल भैरव को कहीं क्षेत्रपाल भूमि के रक्षक या कहीं ग्राम देवता के रूप में तो कहीं भूमिया देव के नाम से जाना जाता है। हमारी देवभूमि उत्तराखंड में भूमिया देवता लगभग प्रत्येक गांव में होते हैं। इन्हें भूमि में उगने वाली फसलों को जंगली जानवरों और प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के लिए भूमि की रक्षा करने के लिए भूमि देवता के रूप में पूजा जाता है। यह पशु एवं खेती की रक्षा करने वाले ग्राम देवता माने जाते हैं। देवभूमि की संस्कृति के अनुसार पौराणिक परंपरा रही है कि जहां भी कोई गांव या शहर बसता है सर्वप्रथम भूमि पूजन किया जाता है। सर्वप्रथम पवित्र भूमिया मंदिर बनाया जाता है। इन्हें ग्राम देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। क्षेत्रपाल का नाम पौराणिक ग्रंथों पुराणों में भी वर्णित है। जब भी गांव या नगर में शुभ कार्य होता है सर्वप्रथम भूमिया देवता की पूजा की जाती है ताकि गांव में सुख समृद्धि एवं शांति बनी रहे। ऐसा माना जाता है कि भूमिया देवता की इजाजत के बिना कोई भी दैवीय शक्ति या बाहरी शक्ति गांव में प्रवेश नहीं कर सकती है। यहां खेतों में उपजे अनाज फल सब्जियां सबसे पहले भूमिया देवता को अर्पित की जाती हैं। यहां तक की जेठ के महीने नए अनाज पैदा होने पर सर्वप्रथम यहां भंडारा लगता है नए अनाज के गेहूं से सर्वप्रथम भूमिया देव के लिए भोग लगाने के लिए प्रसाद बनाया जाता है। तदुपरांत गांव के सभी लोग भंडारे का प्रसाद ग्रहण करते हैं। भूमिया देवता या काल भैरव या बटुक भैरव हम सबकी रक्षा करें।हमारे पशुओं की रक्षा करें एवं हमारे खेत खलिहानों की रक्षा करें इसके अतिरिक्त प्राकृतिक आपदाओ और अनेकों रोग व्याधियों से हम सब की रक्षा करें।

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