क्या है पाश्वपरि या परिवर्तनीय एकादशी व्रत का महत्व

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पाश्वपरि या परिवर्तनीय एकादशी व्रत,,,,,,,,,, परिवर्तनीय का अर्थ है बदलाव जी हां पाठक सोच रहे होंगे कि इस व्रत में बदलाव वाली क्या बात है। या इस एकादशी व्रत को परिवर्तनीय एकादशी क्यों कहते हैं? पाठकों को बताना चाहूंगा की भगवान विष्णु इस समय शयन अवस्था में होते हैं। और इस दिन भगवान साइन अवस्था में करवट बदलते हैं। इसलिए इसे परिवर्तनीय एकादशी कहते हैं। पद्म पुराण और भागवत पुराण के अनुसार इस समय भगवान की पूजा वामन रूप में करनी चाहिए। इसलिए इस रूप की विधि विधान से पूजा करने से इस दिन परमार्थ की प्राप्ति होती है। इस वर्ष सन् 2021 में यह व्रत दिनांक 17 सितंबर दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन एकादशी तिथि 5 घड़ी 19 पल तक है। श्रवण नक्षत्र 53 घड़ी 57 पल तक है । इसका अर्थ हुआ एकादशी तिथि प्रारंभ गुरुवार 16 सितंबर प्रातः 9:36 से एकादशी तिथि समाप्त शुक्रवार दिनांक 17 सितंबर 2021 तक है उसके बाद द्वादशी तिथि प्रारंभ होगी। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग प्रातः 6:17 से 18 सितंबर की प्रात है 3:36 तक रहेगा। इस व्रत का पारण शनिवार दिनांक 18 सितंबर प्रातः 6:50 से 8:23 तक होगा। परिवर्तन एकादशी व्रत की पौराणिक कथा कुछ इस प्रकार है। जो भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। इस कथा में धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से पूछने लगे कि हे भगवान भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका महात्म्य कृपा करके कहिए। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस पुण्य स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली तथा सब पापों का नाश करने वाली उत्तम वामन एकादशी का महत्व मैं तुमसे कहता हूं सुनो। यह पदमा या परिवर्तन एकादशी या जयंती एकादशी भी कहलाती है। इसका व्रत करने से वाजपेई यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं जो मनुष्य इस एकादशी के दिन मेरी वामन रूप की पूजा करता है। उससे तीनो लोक पूज्य होते हैं। इसलिए मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें। जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं वह अवश्य भगवान के समीप रहते हैं। जिसन भाद्रपद शुक्ल एकादशी व्रत और पूजन किया उसने ब्रह्मा विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। भगवान के वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर बोले कि भगवान मुझे अति संदेह हो रहा है कि आप किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं। किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप रखकर क्या-क्या लीलाएं की? चातुर्मास के व्रत की क्या विधि है? तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है। तो आप मुझसे विस्तार से बताइए। भगवान श्री कृष्ण कहने लगे कि हे राजन अब आप सब पापों को नष्ट करने वाली कथा का ध्यानपूर्वक श्रवण करें। त्रेता युग मे बलि नाम का एक दैत्य था। वह मेरा परम भक्त था। विविध प्रकार के वेद सूक्तो से मेरा पूजन किया करता था। और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था। लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया। इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच विचार कर भगवान के पास गए। बृहस्पति सहित इंदिरा अधिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे। इसलिए मैंने वामन रूप धारण करके पांचवा अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया। इतनी बातें सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर बोले की हे जनार्दन आपने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता? भगवान श्री कृष्ण कहने लगे मैंने वामन रूप धारी ब्रह्मचारी बनकर बलि से तीन पग भूमि की याचना करते हुए कहा कि यह तीन पग भूमि मेरे लिए तीन लोक के समान है और हे राजन यह मुझको अवश्य देनी होगी। राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि का संकल्प मुझको दे दिया और मैंने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहां तक कि भूलोक पद भूवलोक में जंघा स्वर्ग लोक में कमर मह लोक में पेट जनलोक में हृदय यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख उसके ऊपर मस्तक स्थापित किया। सूर्य चंद्रमा आदि सब ग्रह गण योग नक्षत्र इंदिरादिक देवता और शेषनाग आदि गणों ने विविध प्रकार के वेद सूक्तो से प्रार्थना की तब मैंने राजा बलि का हाथ पकड़ कर कहा कि हे राजन एक पैर से पृथ्वी दूसरे से स्वर्ग लोक पूर्ण हो गए अब तीसरा पग कहां रखो? तब बलि ने अपना सिर झुका लिया और मैंने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया जिससे मेरा वह भक्त पाताल को चला गया। फिर उसकी विनती और नम्रता को देखकर मैंने कहा कि हे बली मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूंगा। विरोचन के पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन बलि के आश्रम पर मेरी मूर्ति स्थापित हुई। इसी प्रकार दूसरी क्षीर सागर में शेषनाग के पृष्ठ पर हुई हे राजन इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं इसीलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन पूजन करना चाहिए। इस दिन ताबा चांदी चावल और दही का दान करना उचित है। रात्रि को जागरण अवश्य करना चाहिए। जो विधि पूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं। जो पाप नाशक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं उनको हजार अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। लेखक श्री पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल, (उत्तराखंड)

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