मोक्षदा एकादशी व्रत का क्या है विशेष महत्व ही जानते हैं

ख़बर शेयर करें

मोक्षदा एकादशी व्रत।,,,,,,,, प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मोक्षदा एकादशी मनाई जाती है। और प्रत्येक वर्ष इसी दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती है और व्रत रखा जाता है। भगवान विष्णु की पूजा विधिपूर्वक करते हैं एवं कथा पढ़ते हैं अथवा श्रवण करते हैं। इस बार मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ दिनांक 13 दिसंबर दिन सोमवार को रात 9:35 से हो रहा है एकादशी तिथि का समापन अगले दिन 14 दिसंबर को रात 11:00 बज कर 38 मिनट तक है। एकादशी व्रत के लिए उदया तिथि ही मान्य होती है अतः मोक्षदा एकादशी का व्रत मंगलवार दिनांक 14 दिसंबर को रखा जाएगा। इस बार बहुत महत्वपूर्ण योग में एकादशी व्रत मनाया जाएगा इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग भी है। मोक्षदा एकादशी के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग प्रातः 7:06 से अगले दिन 15 दिसंबर दिन बुधवार को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 4:40 तक है। ठीक इसी समय में ही एक दूसरा शुभ योग अमृत सिद्धि योग भी बन रहा है। अत: मोक्षदा एकादशी व्रत का पारण बुधवार दिनांक 15 दिसंबर प्रातः 7:06 से प्रातः 9:10 के बीच करें। मोक्षदा एकादशी के दिन अश्वनी नामक नक्षत्र 54 घड़ी चार पल तक रहेगा। विष्कुंभ आदि योगों में परिधि नामक योग 58 घड़ी 37 पल तक है। बव नामक करण 8 घड़ी 56 पल तक है। यदि चंद्रमा की स्थिति जाने तो इस दिन चंद्रमा पूर्णरूपेण मेष राशि में रहेंगे।. मोक्षदा एकादशी व्रत का महत्व।,,,,, मोक्षदा का अर्थ होता है मोक्षदायिनी अथवा मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी। इस एकादशी व्रत करने से जातक या व्यक्ति को मृत्यु के उपरांत मोक्ष प्राप्त होता है। व्यक्ति इस एकादशी के पुण्य लाभ को अपने पितरों को अर्पित करके उनको मोक्ष दिलाने का प्रयास कर सकते हैं। मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसलिए मोक्षदा एकादशी के दिन को गीता जयंती के रूप में भी मनाया जाता है और एकादशी का महत्व भी और अधिक बढ़ जाता है। हमारे धर्म ग्रंथों में एकादशी के दिन को बहुत पवित्र बताया गया है। मोक्षदा एकादशी को मोह का नाश करने वाला उत्सव मनाया जाता है। जिस प्रकार अन्य एकादशी के दिन भगवान श्री विष्णु का पूजन किया जाता है ठीक इसी प्रकार मोक्षदा एकादशी भी भगवान श्री हरि को समर्पित होती है। हमारे धर्म ग्रंथों में तो ऐसा भी लिखा गया है कि द्वापर युग में महाभारत युद्ध के समय भगवान श्री कृष्ण ने पांडु पुत्र अर्जुन को जब गीता का ज्ञान दिया था तो उस दिन मोक्षदा एकादशी थी इसलिए इसे गीता जयंती के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन रखे गए व्रत से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। मोक्ष को प्राप्त करने के लिए इस व्रत को सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस व्रत को करने से अनंत फल प्राप्त होता है अतः इसे पूर्ण विधि-विधान से करना चाहिए एवं पूरे अनुष्ठान का पालन करना चाहिए। हमारे देश भारत वर्ष के कुछ राज्यों में इस एकादशी से संबंधित परंपराएं कुछ अलग होती हैं। इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ उनके आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण जी की अलग से पूजा की जाती है। इसके साथ साथ श्रीमद भगवत गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ किया जाता है। यदि संभव हो सके तो संपूर्ण गीता का पाठ करना चाहिए।. मोक्षदा एकादशी व्रत की कथा।,,,,,,, नंद नंदन भगवान श्री कृष्ण जी ने पांडू पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत कथा के बारे में बताया था। बताई गई कथा के अनुसार प्राचीन काल में वैखानक नामक एक राजा गोकुल नाम के नगर पर राज करता था। यह राजा अपनी प्रजा का पुत्र की भांति ध्यान रखता था। राजा के राज्य में रहने वाले कई ब्राह्मणों को चारों वेदों का ज्ञान था। राजा को रात्रि में ऐसा सपना आया जिससे कि वह भयभीत हो उठा। उसने अपने स्वप्न में अपने पूर्वजों को नर्क में दुख भोगते हुए पाया। अनेक कष्टों को सहन करते समय राजा के पूर्वज उसे नरक से मुक्त कराने की विनती कर रहे थे। ऐसा भयानक दृश्य देखकर राजा बहुत भयभीत हुए। तब राजा ने एक सुप्रसिद्ध विद्वान के पास जाकर अपना स्वप्न विस्तार से बताया और इसके उपाय के बारे में पूछा। राजा ने कहा वह अपने पितरों की शांति के लिए कोई भी तप दान पूजा और व्रत आदि कर सकते हैं। कृपा करके इसका जो भी उपाय हो उसे मुझे बताएं। सब ब्राह्मणों ने राजा को पर्वत ऋषि के आश्रम में जाने का सुझाव देते हुए कहा कि वह ऋषि भूत भविष्य के ज्ञाता है वह अवश्य ही आपकी समस्या का समाधान करेंगे। ऐसा सुनकर राजा शीघ्र अति शीघ्र उस आश्रम के लिए निकल गया। तब उस मुनि ने राजा को बताया कि तुम्हारे भूतकाल में किए गए पाप के कारण तुम्हारे पूर्वज नरक में दुख भोग रहे हैं। यदि तुम अपने परिवार सहित मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी के व्रत को करोगे तो उसके प्राप्त पुण्य से तुम्हारे पितर नरक से मुक्त हो जाएंगे। राजा ने ऋषि को दंडवत प्रणाम किया। और उनके द्वारा बताए गए मोक्षदा एकादशी के व्रत को किया। वाजपेय यज्ञ के समान फल देने वाले इस व्रत को करने से राजा के पूर्वजों को स्वर्ग प्राप्त हुआ। इस व्रत को करने से सभी कष्टों का नाश हो जाता है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए इस व्रत को सबसे उत्तम माना गया है। हमारे देश भारत वर्ष में इस पर्व को अधिकतर स्थानों पर गीता जयंती का उत्सव मानकर श्री कृष्ण महर्षि व्यास और पवित्र ग्रंथ श्रीमद भगवत गीता का पूजन किया जाता है। वहीं दूसरी ओर इस एकादशी में भगवान विष्णु को पूजा जाता है। इसलिए हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए इस दिन का विशेष महत्व होता है। यह दिन पितरों के पूजन के लिए भी उत्तम माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन विधि एवं विधान से किए गए कर्मकांड से पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त होता है। और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन जब पांडू पुत्र धनुर्धर अर्जुन अपने कर्तव्य पथ से विचलित हो रहे थे तब विष्णु अवतार में भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को 45 मिनट तक गीता का उपदेश दिया था। यह मोक्षदा एकादशी का दिन ही था। मोक्षदा एकादशी के दिन श्रीमद भगवत गीता को पढ़ा जाता है और उसमें दिए गए उपदेशों को जीवन में धारण किया जाता है। हिंदू अपने इस धर्म ग्रंथ को लाल वस्त्र में लपेटकर घर में पूजा स्थल में रखते हैं। मोक्षदा एकादशी के दिन गीता जयंती मनाई जाती है इसलिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। श्रीमद भगवत गीता के ग्यारहवें अध्याय के प्रथम श्लोक में ही अर्जुन ने कहा है – मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसनि्ज्ञतम ।यत्वयोक्तं वचस्तेन मोहोअ्यं विगत मम ।। अर्थात अर्जुन बोलते हैं की मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय आध्यात्मिक विषयक वचन अर्थात उपदेश कहे हैं उसी से मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है। इसके अतिरिक्त पांडु पुत्र अर्जुन ने उस समय संपूर्ण जगत को श्री कृष्ण भगवान के उस शरीर में एक स्थान पर स्थित देखा।

Ad

लेटेस्ट न्यूज़ अपडेट पाने के लिए -

👉 वॉट्स्ऐप पर समाचार ग्रुप से जुड़ें

👉 फ़ेसबुक पर जुड़ने हेतु पेज लाइक-फॉलो करें

👉 हमारे मोबाइल न० 9410965622 को अपने ग्रुप में जोड़ कर आप भी पा सकते है ताज़ा खबरों का लाभ

👉 विज्ञापन लगवाने के लिए संपर्क करें

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You cannot copy content of this page