माघ मास में तिल दान का महत्व- पंडित प्रकाश जोशी नैनीताल

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माघ मास में तिल दान का महत्व, तिल वैसे तो सबसे छोटी वस्तु मानी जाती है, परन्तु इसका दान सबसे महत्वपूर्ण है, सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से उत्तरायण का प्रारंभ होता है माघ मास से तिल तिल दिन की लम्बाई बढती जाती है वही रात छोटी होने लगती है, प्रकाश की चमक अन्धकार के अस्तित्व को क्षीण करती है, सूर्य का प्रकाश उत्तर दिशा से आता है, उत्तर ही देव दिशा है, उत्तरायण में देवताओं का दिन और असुरौ की रात होती है, उत्तर से आनेवाले प्रकाश में दैवीय ऊर्जा और दैवीय अस्तित्व की प्रधानता होती है, जो माघ मास में ब्राह्मणों को तिल दान करता है वह समस्त जंतुओं से भरे हुए नरक का दर्शन नहीं करताहै, लिखा है, माघ मासे तिलान् वस्तु ब्राह्मणेभ्यप्रयच्छति, सर्वतत्व समाकीर्ण नरकंसन पश्यति, इस मास में तिल दान के साथसाथ शिव मंदिर में तिल के तेल का दीपक जलाया जा सकता हैं, तिल सहित चावल से शंकर जी का पूजन किया जाता है, काले तिल से पित्र तर्पण किया जाता है, दान पुण्य के बारे में कहा गया है, माघ मासे महादेव योदध्यात घृतकम्बलम, सभुत्मा सकलान भोगान् अंतेमोक्षचं विनंदति, अर्थात, इस मास में घी और कंबल दान का विशेष महत्व है, इसका दान करने वाले संपूर्ण भोगौ को भोग कर मोक्ष को प्राप्त होता है, रवि संक्रमणे प्रासेन स्नानाध्यस्तु मानव: सप्तजन्मनि रोगो स्द्यन्निध्र्नक्ष्चैव जायते, अर्थात, सूर्य संक्रांति के दिन जो मनुष्य स्नान नहीं करते वह सात जन्मों तक रोगी होता है,

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