विशेष लेख: हरेला—हरियाली, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का लोकपर्व

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नैनीताल से अंकिता मेहरा रिपोर्ट

नैनीताल। उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति में हरेला का विशेष स्थान है। यह केवल एक पारंपरिक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण, कृषि और सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला लोकपर्व है। हरेला हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित भविष्य सुरक्षित रखने की प्रेरणा देता है।
‘हरेला’ का शाब्दिक अर्थ है हरियाली। उत्तराखंड में यह पर्व वर्ष में तीन बार—चैत्र, श्रावण और आश्विन मास में मनाया जाता है। इनमें श्रावण मास का हरेला सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। परंपरा के अनुसार सावन शुरू होने से नौ दिन पहले पांच या सात प्रकार के अनाज बोए जाते हैं। श्रावण के प्रथम दिन इन अंकुरित पौधों की पूजा कर उन्हें काटा जाता है। इसके बाद परिवार के बुजुर्ग हरेला सिर पर रखकर बच्चों और परिजनों को दीर्घायु, सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं।
लोकमान्यता है कि श्रावण मास के प्रथम दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसी कारण हरेला को शिव-पार्वती के मंगल मिलन और हरियाली के उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इस अवसर पर मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘डीकारे’ कहा जाता है। इनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है।
हरेला का सबसे महत्वपूर्ण संदेश पर्यावरण संरक्षण है। इस दिन व्यापक स्तर पर पौधारोपण किया जाता है और लोगों को जल, जंगल तथा जमीन के संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाता है। वृक्ष न केवल कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने में सहायक हैं, बल्कि मिट्टी के कटाव को रोकने, भूजल स्तर बढ़ाने और जैव विविधता के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए हरेला प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की सीख भी देता है।
आज जब जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के सामने गंभीर चुनौती बन चुका है, ऐसे समय में हरेला का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति इस पर्व पर कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करने का संकल्प ले, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है।
हरेला उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति का संरक्षण ही मानव जीवन की सुरक्षा और समृद्धि का आधार है।
हरेला का पारंपरिक आशीर्वाद
“जी रया, जागि रया।
दूबक जस जड़ हैजो, पात जस फैल हैजो।
स्यालक जस बल हैजो।
हिमालय में ह्यूँ छन तक, गंगा में पानी छन तक, हरेला त्यार माने रया।”
— साभार: डॉ. ललित तिवारी

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